यह अफसोसनाक है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए मुरुगन, संथन और पेरारिवलन की मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने के सर्वोच्च अदालत के फैसले के 24 घंटे के भीतर ही तमिलनाडु की जयललिता सरकार ने इन तीनों के साथ ही चार अन्य दोषियों की रिहाई का फैसला कर लिया! इसके पीछे वही राजनीति है, जिसकी ओर सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में इशारा किया है।
असल में राजनीतिक कारणों से ही इन तीनों की दया याचिका को 11 वर्षों से भी अधिक समय तक लटकाए रखा गया। यही वजह है कि जम्मू-कश्मीर के सियासी दल अफजल गुरु को दी गई फांसी को सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के आलोक में राजनीति से जोड़कर देख रहे हैं। वैसे इस पूरे घटनाक्रम ने मृत्युदंड और दया याचिका जैसे दो महत्वपूर्ण मुद्दों पर नए सिरे से विचार करने का मौका दिया है। भारत दुनिया के उन कुछ देशों में शामिल है, जहां अब भी मृत्युदंड का प्रावधान है, लेकिन हमारे यहां सिर्फ दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में ही मृत्युदंड दिया जाता है, जो कि हमारी न्यायिक व्यवस्था का एक मजबूत पक्ष है।
दूसरा मुद्दा राष्ट्रपति और राज्यपाल को मिले दया देने के अधिकार से जुड़ा हुआ है, जिसका फैसला दरअसल सरकारें ही करती हैं। यदि इस मामले को ही देखें, तो यूपीए ही नहीं, उसकी पूर्ववर्ती एनडीए सरकार ने भी इसे टालने का ही काम किया। इस क्रम में राहुल गांधी के इस बयान पर गौर किया जाना चाहिए कि वह खुद मृत्युदंड के खिलाफ हैं, लेकिन वह अपने पिता के हत्यारों की रिहाई के पक्ष में नहीं हैं। मगर उन्हें एहसास होगा कि इस मामले में शुरू से राजनीति की गई, जिसमें उनकी कांग्रेस भी पीछे नहीं थी।
कुछ दिन पहले ही सर्वोच्च अदालत ने दया याचिका में देरी की वजह से विभिन्न आरोपों में दोषी ठहराए गए 15 लोगों की मौत की सजा को उम्रकैद में बदलते हुए अपने फैसले में दोषी ठहराए जा चुके व्यक्ति के मौलिक अधिकार और मानवाधिकार को भी रेखांकित किया था। उसका यह फैसला उसी का विस्तार लगता है। मगर मुश्किल यह है कि न्यायपालिका व्यवस्था की जिस बीमारी की ओर इशारा कर रही है, उसकी ओर कार्यपालिका ध्यान देने को तैयार नहीं दिखती।