रेलवे सुरक्षा के लिहाज से लेवल क्रॉसिंग को खत्म किए जाने की बातें प्रायः हर रेल बजट में की जाती हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इस दिशा में कोई ठोस पहल अब तक नहीं हो पाई है। तेलंगाना के मेडक जिले में मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर एक यात्री ट्रेन और एक स्कूली बस के बीच हुई टक्कर ने एक बार फिर इस ओर ध्यान खींचा है। इस हादसे में मारे गए उन बच्चों का आखिर कसूर क्या था? क्या ऐसे हादसों के लिए तयशुदा मुआवजे उन मासूमों की भरपाई कर पाएंगे, जो घर से स्कूल जाने के लिए निकले थे?
रेलवे सुरक्षा की समीक्षा के लिए अनिल काकोदकर की अगुआई में गठित उच्च स्तरीय समिति ने 2012 में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में रेल हादसों और इसकी वजह से होनेवाली मौतों के लिए लेवल क्रॉसिंग को सबसे बड़ा कारण माना था और अगले पांच वर्ष में उन्हें हटाने की सिफारिश की थी। 12वीं पंचवर्षीय योजना में भी 10,797 लेवल क्रॉसिंग को खत्म करने का प्रस्ताव किया गया है, पर जमीनी स्तर पर ऐसी पहल नजर नहीं आती। देश भर में इस समय 31 हजार से अधिक लेवल क्रॉसिंग हैं, जिनमें से तकरीबन साढ़े बारह हजार मानवरहित हैं। मेडक जिले में जिस जगह यह हादसा हुआ, वह तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद से महज 70 किलोमीटर दूर है। इससे देश के दूरस्थ हिस्सों में मौजूद लेवल क्रॉसिंग में सुरक्षा का सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है।
काकोदकर समिति का आकलन था कि लेवल क्रॉसिंग हटाने के लिए 50,000 करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होगी, मगर इससे ट्रेनों के परिचालन पर होने वाले खर्च में बचत हो सकेगी। हाल ही में रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा ने राज्यसभा को जानकारी दी थी कि रेलवे ने सब-वे, अंडरब्रिज और ओवरब्रिज जैसे उपायों के जरिये मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग को हटाने का निर्णय लिया है। जाहिर है, ऐसे उपायों के लिए रेलवे और राज्य सरकारों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत होगी। लेवल क्रॉसिंग पर हुए हादसों के बाद मामला अक्सर मोटर व्हीकल ऐक्ट और रेलवे ऐक्ट की धाराओं में भी उलझ जाता है, जिससे जवाबदेही तय करने में तो मुश्किल आती ही है, राहत और मुआवजा मिलने में भी देरी होती है। वास्तव में ऐसे हादसों से बचने के लिए लेवल क्रॉसिंग खत्म करने के साथ ही सिग्नलिंग व्यवस्था को भी दुरुस्त करने की जरूरत है, जिसमें अब और देर नहीं होनी चाहिए।