यौन हिंसा के खिलाफ सख्त कानून बनने के पखवाड़े भर के भीतर राष्ट्रीय राजधानी से महज सत्तर किलोमीटर दूर बुलंदशहर में बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने गई दस साल की एक लड़की को रात भर पुलिस हिरासत में रखने की यह घटना बताने के लिए काफी है कि सिर्फ कानून बदल देने से स्त्रियों के प्रति नजरिया नहीं बदल सकता।
वह तो सर्वोच्च न्यायालय ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया, वर्ना तो रिपोर्ट दर्ज कराने गई डरी हुई लड़की और उसकी असहाय मां के प्रति महिला पुलिस का व्यवहार भी बहुत सहयोग भरा नहीं था।
अगर दलित कानून का भय और विपक्षी राजनीतिक पार्टी के हमलावर होने की आशंका के कारण यौन दुर्व्यवहार की शिकायत कराने आई दलित लड़की को थाने में पहचान छिपाकर रखने की बात खुद पुलिस वाले कहें, तो यही राज्य की बदतर कानून-व्यवस्था के बारे में बहुत कुछ कह देता है।
इसलिए मेडिकल रिपोर्ट में अगर बलात्कार की पुष्टि नहीं होती है, तब भी यह न तो उस पुरुष के निर्दोष होने का सुबूत होगा, न ही पुलिस-प्रशासन के अपनी पीठ थपथपाने का कारण बनेगा। उस बुलंदशहर में तो और नहीं, जहां पिछले एक महीने में बलात्कार की घटनाएं चौंकाने वाली हैं।
इसलिए आरोपी के अलावा कोतवाली पुलिस के उन जवानों के खिलाफ भी कार्रवाई जरूरी है, जो लड़की को महिला थाने में छोड़कर चले गए। लड़की और उसके परिजन को सुरक्षा की भी गारंटी मिलनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के अलावा इस लड़की के लिए तो मानवाधिकार आयोग ने भी आवाज उठाई है, वर्ना बुलंदशहर के ही मदनपुर में गैंगरेप का शिकार हुई एक लड़की की न सिर्फ पहली मेडिकल रिपोर्ट संदिग्ध थी, बल्कि अदालत परिसर में उसके परिवार को दी गई धमकी की रिपोर्ट लिखने तक के लिए पुलिस वाले तैयार नहीं थे।
यह उस राज्य का हाल है, जो न सिर्फ राष्ट्रीय राजधानी से सटा हुआ है, बल्कि जिसके युवा मुख्यमंत्री से उम्मीदें भी कुछ कम नहीं थीं।
डीएसपी की हत्या के बाद कुंडा पहुंचने वाले मुख्यमंत्री को बुलंदशहर की घटना क्या इसलिए परेशान नहीं कर रही कि इससे उनकी चुनावी राजनीति पर कोई बहुत फर्क नहीं पड़ने वाला!
अगर यही हाल रहा, तो जल्दी चुनाव के लिए दबाव बनाने की सपा की रणनीति खुद उसे महंगी पड़ सकती है।