गुजरात में ओबीसी के तहत आरक्षण की मांग कर रहे पटेल समुदाय के आंदोलन ने जिस तरह की हलचल पैदा कर दी है, उससे इस समुदाय की ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। पटेल या पाटीदार समुदाय के नए नेता बनकर उभरे 22 वर्षीय नौजवान हार्दिक पटेल प्रदेश और केंद्र सरकार को जिस अंदाज में चुनौती दे रहे हैं, उससे यह भी साफ है कि उनका आंदोलन भले ही आरक्षण की मांग को लेकर है, पर उनका निशाना कहीं और है।
हकीकत यह है कि गुजरात की आबादी में 20 फीसदी की हिस्सेदारी करने वाले पाटीदार सामाजिक और आर्थिक, दोनों ही रूप में खासा दबदबा रखते हैं। हीरा उद्योग से लेकर रियल एस्टेट और शिक्षा के कारोबार में उनका वर्चस्व तो है ही, इस समुदाय को खेती के क्षेत्र में भी मजबूत माना जाता है। करीब तीन दशक से प्रदेश की राजनीति में उसका खासा प्रभाव रहा है, बल्कि सच तो यह है कि उसकी मर्जी के बिना मुख्यमंत्री तक नहीं बनता। मौजूदा प्रदेश सरकार में ही मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के अलावा छह मंत्री और हैं! दूसरी ओर हार्दिक ओबीसी के भीतर पटेल समुदाय को जोड़ने की मांग कर रहे हैं, जिसमें पहले ही 127 समुदाय शामिल हैं।
वह भले ही इस आंदोलन को गैर राजनीतिक बता रहे हैं, पर वह जिस तरह के जुमले उछाल रहे हैं, उससे आरक्षण के नाम पर किए जा रहे इस आंदोलन के राजनीतिक निहितार्थ भी स्पष्ट हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह प्रदेश में हो रहे इस आंदोलन को रोक पाने में अब तक नाकाम आनंदीबेन पटेल सरकार को बातचीत से कोई रास्ता निकालना चाहिए, वरना भूलना नहीं चाहिए कि तीन दशक पहले आरक्षण के विरोध में हुए एक आंदोलन ने सूबे को किस तरह आग के हवाले कर दिया था।
यह भी गौर करने की जरूरत है कि मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के 25 वर्ष बाद भी सामाजिक न्याय के नारे की राजनीति खत्म नहीं हुई है। मंडल आयोग की सिफारिश लागू किए जाने से उम्मीद की गई थी, इससे विकास के क्रम में पिछड़ गए ऐसे वर्ग के साथ सामाजिक न्याय हो सकेगा, जो अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग में नहीं आते। पर कालांतर में ओबीसी आरक्षण राजनीति का बड़ा जरिया ही बन गया; जबकि आरक्षण से कहीं अधिक जरूरत अवसर पैदा करने की है।