जयंती नटराजन को पर्यावरण और वन मंत्रालय से बाहर निकालकर संप्रग सरकार यह जता रही है, मानो उसने विकास के रास्ते का एक बड़ा रोड़ा हटा दिया है। एक अर्थ में यह सही है भी। पांच फीसदी की आर्थिक विकास दर के लिए तरसते मुल्क में पैंतीस से भी अधिक परियोजनाओं का महीनों तक रास्ता रोके रखना विवेकसम्मत फैसला नहीं माना जा सकता था।
जी एम फसलों पर नटराजन का रुख सरकार के फैसले से अलग था, तो राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की परियोजना पर पर्यावरण मंत्रालय के अड़ंगे के खिलाफ खुद प्रधानमंत्री कार्यालय को सक्रिय होना पड़ा! उनके करीब दो साल के कार्यकाल में ऐसे कई मामले सामने आए। इसलिए केंद्र के कुछ वरिष्ठ मंत्री ही नहीं, कई राज्यों के मुख्यमंत्री तक उनसे असंतुष्ट थे। उद्योग संगठन फिक्की के एक कार्यक्रम में राहुल गांधी ने उद्योगपतियों की शिकायतों पर सहमति जताते हुए जिस तरह यह कहा कि पर्यावरण मंत्री या मुख्यमंत्री को मनमाने ढंग से फैसले लेने का अधिकार नहीं है, वह भी यही जताता है।
लेकिन यह मामला इतना भर नहीं है। आर्थिक उदारीकरण के दौर में पर्यावरण मंत्रालय का कामकाज बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया है। उसे पर्यावरण से जुड़े सख्त कानूनों का पालन करना पड़ता है, विभिन्न एजेंसियों से मंजूरी लेनी पड़ती है, स्थानीय लोगों की आपत्तियों को ध्यान में रखना पड़ता है, और सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों पर भी अमल करना पड़ता है।
यूपीए-एक सरकार में ए राजा जैसे पर्यावरण मंत्री हुए, जिन्होंने बिना आगा-पीछा देखे परियोजनाओं को मंजूरी दी, जिससे अवैध खनन को बढ़ावा मिला, तो जयराम रमेश की आलोचना पर्यावरण हितैषी कहकर की गई। इसी कारण उन्हें पर्यावरण मंत्रालय से जाना भी पड़ा। मुश्किल यह है कि अगर मंजूरी देने में देरी हो, तो उद्योग घरानों की भृकुटियां तन जाती हैं, और अगर उत्तराखंड जैसी त्रासदी हो जाए, तो पर्यावरण मंत्रालय को ही कोसा जाता है।
जयंती नटराजन पहला उदाहरण नहीं हैं, इससे पहले भी शिकायतों पर कई मंत्रियों को बाहर किया गया या उनके विभाग बदले गए। अलबत्ता आर्थिक मोर्चे पर पहले से जैसी बदहाली है, उसमें यह मानने का कारण नहीं कि मंत्रिमंडल में हुए इस फेरबदल से कोई सुखद बदलाव आ जाएगा।