बिहार विधानसभा चुनाव के लिए नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का साझा उम्मीदवार घोषित करने से साफ है कि जनता दल (यू) और राष्ट्रीय जनता दल किसी भी तरह वोटों का बिखराव नहीं चाहते। दरअसल जनता परिवार के एकजुट होने की पिछले कई महीने से चल रही कवायद के अब तक परवान नहीं चढ़ने के बावजूद यदि लालू यादव को नीतीश के नाम पर सहमति जतानी पड़ी है, और वह भी इसकी घोषणा के लिए मुलायम सिंह यादव को आगे आना पड़ा है, तो समझा जा सकता है कि आगामी चुनाव जनता परिवार के घटकों के अस्तित्व के लिहाज से कितना अहम है।
जैसा कि नीतीश ने स्पष्ट किया है, इस गठजोड़ में कांग्रेस पहले से ही है, लिहाजा सितंबर-अक्तूबर में होने वाले चुनाव में भाजपा की अगुआई वाले एनडीए और इस गठजोड़ के बीच ही मुकाबला होना है। हालांकि जनता परिवार के नेताओं को ध्यान रखना होगा कि बिहार के जातिगत समीकरणों की सच्चाई के बावजूद देश 90 के दशक के मंडल बनाम कमंडल के दौर से काफी आगे निकल चुका है।
लिहाजा सिर्फ सांप्रदायिकता के मुद्दे पर वोटरों को नहीं लुभाया जा सकता। और फिर यह भी सच है कि बिहार में नीतीश के लंबे शासनकाल में दो वर्ष पहले तक भाजपा भी उसकी साझेदार थी! दूसरी ओर भाजपा की अगुआई वाले एनडीए को भी यह देखना होगा कि मई, 2014 के लोकसभा चुनाव के समय की 'मोदी लहर' अब कमजोर पड़ चुकी है, जैसा कि दिल्ली के विधानसभा चुनाव से यह साबित भी हो चुका है।
प्रधानमंत्री मोदी की छवि के साथ ही भाजपा को भी विकास का ऐसा मॉडल सामने रखना होगा, जिसमें दलितों, महादलितों और मुस्लिमों के हित भी सुरक्षित रहें। इस सच से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि चुनाव में रणनीतिक साझेदारियां बहुत काम आती हैं।
यदि लोकसभा चुनाव के नतीजों पर गौर करें, तो एनडीए को 31 सीटें मिली थीं, जिसमें उसने 243 विधानसभा सीटों में से 185 सीटें जीती थीं। इस बार एनडीए ने बिहार में मिशन 185 प्लस का लक्ष्य रखा है। पर यदि नीतीश और लालू के नए गठजोड़ को देखें, तो लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा के उपचुनावों में दस में से छह सीटें इस गठबंधन ने जीती हैं। जाहिर है, बेमेल ही सही, इस जोड़ी ने नरेंद्र मोदी की अगुआई वाले एनडीए के समक्ष कड़ी चुनौती पेश कर दी है।