वर्ष 2030 तक कार्बन उत्सर्जन कम करने की विस्तृत कार्ययोजना संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण निकाय (यूएनएफसीसीसी) को हमारी सरकार ने भले आखिरी वक्त में सौंपी हो, पर इसके मसौदे से जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने की हमारी प्रतिबद्धता का पता चलता है। भारत के मसौदे में जो तीन प्रमुख घोषणाएं हैं, उसमें एक यह है कि अगले पंद्रह वर्षों में यहां ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 2005 के स्तर से तैंतीस से पैंतीस प्रतिशत कम किया जाएगा। यह पिछले लक्ष्य का ही विस्तार है; इससे पहले जब उत्सर्जन पर वैश्विक समझौता होते-होते रह गया था, तब भारत ने 2020 तक 2005 के स्तर से बीस से पच्चीस फीसदी उत्सर्जन कम करने की न सिर्फ प्रतिबद्धता जताई थी, बल्कि 2010 तक इसमें बारह फीसदी की कमी भी आई थी।
लिहाजा अगले डेढ़ दशक में उत्सर्जन को करीब एक तिहाई घटाने का वायदा पूरा हो सकता है। पर इस दौरान गैर जीवाश्म ईंधन से चालीस प्रतिशत विद्युत उत्पादन करने का लक्ष्य व्यावहारिक नहीं लगता। खासकर तब, जब स्वच्छ ऊर्जा पर अतिशय जोर देने और इसके लिए समुचित संसाधन होने के बावजूद अमेरिका में 2030 तक गैर जीवाश्म ईंधन से विद्युत उत्पादन कुल उत्पादन के तीस फीसदी से अधिक नहीं हो पाएगा। अतिरिक्त वन एवं हरित पर्यावरण के जरिये कार्बन डाई-ऑक्साइड का ढाई से तीन अरब टन का अतिरिक्त कार्बन सिंक तैयार करने का हमारा लक्ष्य भी आसान नहीं है, पर हरित क्षेत्र के बढ़ते अनुपात को देखते हुए इसे हासिल किया जा सकता है।
कार्बन उत्सर्जन से निपटने की भारत की कार्ययोजना न सिर्फ चीन और अमेरिका जैसे बड़े उत्सर्जकों की तुलना में बेहतर है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ हमारे यहां कई दूसरी योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। पर इसका ध्यान रखना होगा कि यह अभियान ऐसे व्यावसायिक अवसर में न तब्दील हो जाए, जिसका लाभ सिर्फ विकसित देशों को मिले। पृथ्वी को बचाने के लिए आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल और नवाचार का लाभ गरीब देशों को भी देना होगा। इसलिए भी, क्योंकि पृथ्वी को प्रदूषित करने में वे विकसित देशों की तुलना में कम जिम्मेदार हैं।