देश के पांच सौ जिलों को सूखा आपात योजना में शामिल करने का केंद्र सरकार का फैसला यह साफ-साफ बताता है कि अच्छे दिनों की उम्मीद के बावजूद सूखे के रूप में एक बड़ी चुनौती हमारे सामने है। करीब आधी जुलाई बीत चुकी है, लेकिन स्थिति यह है कि देश के बड़े हिस्से में सूखे पड़े खेत अब भी वर्षा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इस कारण खरीफ फसल की बुआई तो कम हुई ही है, जल्दी ही पर्याप्त बारिश न हुई, तो बुआई वाले क्षेत्रों में भी भारी नुकसान की आशंका है, क्योंकि फसल पीली पड़ती जा रही है।
उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में अगर अब भी पानी बरसता है, तो खरीफ की पछेती किस्म बोई जा सकती है, लेकिन महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में तो अब इसकी भी संभावना नहीं है, क्योंकि वहां पहले ही देर हो चुकी है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में धान के साथ-साथ मोटे अनाज, दलहन और तिलहन की बुआई भी प्रभावित हुई है। अनुमान के मुताबिक, बारिश के अभाव में एक चौथाई खेती अब तक चौपट हो चुकी है, जिस कारण खरीफ उत्पादन ढाई से तीन करोड़ टन कम रह सकता है!
धान के उत्पादन में तो इस बार खासकर कमी की आशंका है, क्योंकि बारिश देरी से और अपर्याप्त होगी, तो किसानों के सामने मोटे अनाज की बुआई के सिवा विकल्प नहीं रहेगा। ऐसी ही आशंका तिलहन फसलों के उत्पादन के बारे में भी जताई जा रही है। इससे पहले सूखे की स्थिति में हमें चीनी और दाल से लेकर खाद्य तेल तक आयात करने पड़े थे। अगर वैसी स्थिति पैदा होगी, तो आयात बिल और महंगाई बढ़ने से अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित होगी।
सूखा सिर्फ खेती ही चौपट नहीं करता, बल्कि अपने साथ और भी कई मुसीबतें लेकर आता है। बारिश के अभाव में देश भर के जलाशयों में इस बार जल संग्रह काफी कम हुआ है, जिससे आने वाले दिनों में पेयजल का संकट गहरा सकता है। सूखे में पशुओं के लिए चारे का संकट भी पैदा होता है, जिससे दूध का उत्पादन तो घटता ही है, खुद पशुओं का जीवन भी संकटग्रस्त हो जाता है। खेत सूखते हैं, तो किसानों और खेत मजदूरों की रोजी-रोटी भी छिन जाती है। इसी आशंका को ध्यान में रखते हुए इस बार मनरेगा में डेढ़ सौ दिनों तक रोजगार की जरूरत बताई जा रही है। कुल मिलाकर, आने वाले दिन खेती-किसानी से लेकर अर्थव्यवस्था के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित होने वाले हैं।