कांग्रेस ने राहुल गांधी को भले ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है, लेकिन अगले लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी के प्रचार अभियान की कमान उन्हें सौंपकर पार्टी ने एक तरह से औपचारिकता ही पूरी की है। दरअसल चार विधानसभा चुनावों में मिली पराजय से कांग्रेस को गहरा झटका लगा और कार्यकर्ताओं का मनोबल भी काफी कमजोर हो गया था। घोटालों, भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दों की वजह से पहले ही यूपीए सरकार और कांग्रेस की साख को धक्का लगा है।
नई जिम्मेदारी संभालने के साथ राहुल ने आक्रामक तरीके से भाषण देकर एक तरह से पस्त पड़ी पार्टी में जोश भरने की कोशिश की है, मगर उनकी चुनौतियां पहाड़ जैसी हैं। राहुल ने नरेंद्र मोदी पर तो परोक्ष हमला किया ही, अरविंद केजरीवाल का नाम लिए बिना उन पर जिस तरह से निशाना साधा, उससे समझा जा सकता है कि कांग्रेस भाजपा के साथ ही आम आदमी पार्टी को भी गंभीरता से ले रही है।
राहुल ने यूपीए सरकार के दौरान पारित किए गए सूचना के अधिकार विधेयक से लेकर लोकपाल विधेयक तक का श्रेय कांग्रेस को देने की कोशिश की, मगर वह इस सच्चाई को नहीं झूठला सकते कि यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान ही कोयला और 2 जी स्पेक्ट्रम जैसे बड़े घोटाले सामने आए और महंगाई ने अब तक के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। ऐसे में वह भ्रष्टाचार के खिलाफ जिन छह विधेयकों को जल्दी पारित किए जाने का आह्वान कर रहे हैं, उस पर कैसे भरोसा किया जाएगा!
वैसे भी मौजूदा लोकसभा का कार्यकाल कुछ महीने का रह गया है, जिसमें लेखानुदान भी पारित किया जाना है। मगर उनकी असल चुनौती लोकसभा चुनावों को लेकर है; जिसमें कांग्रेस के संभावित प्रदर्शन को लेकर पार्टी के भीतर भी गहरी हताशा है। राहुल संगठन के निचले स्तर से उम्मीदवार चुनने की बात कर रहे हैं, मगर यह नहीं भूलना चाहिए कि बीते विधानसभा चुनावों के दौरान भी उम्मीदवारों के चयन में जिस कथित 'राहुल फॉर्मूले' के आधार पर टिकट दिए जाने के दावे किए जा रहे थे, उसकी धज्जियां उड़ा दी गईं।
अलबत्ता उन्होंने किसी भी क्षेत्रीय दल पर निशाना न साधकर आम चुनावों के बाद की राजनीतिक संभावनाओं को बचाए रखने की कोशिश जरूर की है। हालांकि उन्होंने बार-बार कांग्रेस के इतिहास और उसकी विरासत की दुहाई दी, लेकिन वह यह भी जानते होंगे कि सियासी लड़ाइयां वर्तमान में लड़ी जाती हैं।