अपने दूसरे भारत दौरे में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन एक मित्र से कहीं अधिक कुशल व्यापारी की तरह नजर आए हैं। एक ओर तो उन्होंने ब्रिटेन पहुंचने वाले भारतीय व्यापारियों को आसान वीजा और वहां रह रहे और वहां जाने के इच्छुक भारतीय छात्रों को कई तरह की रियायतें देने की घोषणा की है, दूसरी ओर वह चाहते हैं कि भारत भी ब्रिटिश कंपनियों का खास ध्यान रखे। उन्होंने यह मंशा भी जताई है कि उनके देश की कंपनियां भारत में आधारभूत संरचना के क्षेत्र में अच्छा योगदान कर सकती हैं।
वास्तव में ब्रिटेन और उसके इस पूर्व उपनिवेश के रिश्ते प्रकारांतर में मजबूत ही हुए हैं, इसका सबसे बड़ा सुबूत तो यही है कि ब्रिटेन जहां भारत में यूरोप का सबसे बड़ा निवेशक है, वहीं यूरोप में कुल भारतीय निवेश का आधा हिस्सा अकेले ब्रिटेन में है। इसके बावजूद यदि कैमरन भारत को 2030 तक दुनिया की तीसरी बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में देख रहे हैं, तो उनके इस आकलन में एक व्यापारिक कौशल भी है।
सच्चाई यह है कि पिछले कुछ वर्षों से यूरोपीय क्षेत्र जिस संकट से गुजर रहा है, उसका असर ब्रिटेन पर भी पड़ा है और उसे अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाए रखने के लिए भारत जैसे चमकते सहयोगी की जरूरत है। कैमरन ने भारत के साथ असैन्य परमाणु समझौता करने की भी इच्छा जताई है, ताकि भारत के परमाणु बिजली क्षेत्र में ब्रिटिश कंपनियों को मौका मिल सके। यदि भविष्य में ऐसा कोई करार होता है, तो इससे भारत को भी फायदा होगा, क्योंकि इससे उसकी सुरक्षा परिषद में दावेदारी को मजबूती मिलेगी।
मगर यह नहीं भूलना चाहिए कि कैमरन ने भारत आने से कुछ पहले ही लंदन में पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई से मुलाकात की थी। द्विपक्षीय संबंध और व्यापार अपनी जगह हैं, लेकिन अफ-पाक क्षेत्र में ब्रिटेन की दिलचस्पी को भारत के सामरिक हितों के बरक्स देखने की जरूरत है। बहरहाल, कैमरन के लिए भारत के साथ दोस्ती का नजराना पेश करने का एक मौका अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर मामले के रूप में सामने है, जिसमें वह जांच में मदद कर सकते हैं, ताकि इस सौदे के सच को सामने लाया जा सके।