हाल के वर्षों में टेक्निकल और मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में खासी वृद्धि हुई है, लेकिन इस पर बहुत गर्व करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इसका उच्च शिक्षा की गुणवत्ता से कोई खास लेना-देना नहीं है।
बल्कि यह शिक्षा को कारोबार में बदलने का खेल है, जिसका सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर संज्ञान लिया है और निजी व स्व वित्तपोषित संस्थाओं द्वारा संचालित टेक्निकल और मेडिकल कॉलेजों में कैपिटेशन फीस वसूलने को अनैतिक और अवैध करार दिया है।
इसके बावजूद अभी यह कहना मुश्किल है कि उसका यह फैसला व्यावहारिक स्तर पर कितना अमल में आ पाएगा। आखिर अतीत में कम से कम दो बार संविधान पीठ ने भी कैपिटेशन फीस पर रोक लगाने संबंधी फैसले दिए हैं, मगर यह मर्ज बढ़ता ही जा रहा है।
दरअसल सरकारी नीतियों की खामियों और नियामक संस्थाओं की ढील का फायदा उठाकर निजी संस्थानों ने मनमाने तरीके से टेक्निकल और मेडिकल कॉलेज खोले हैं, जहां मोटी फीस वसूल कर दाखिले दिए जाते हैं।
यह इसलिए चिंता की बात है, क्योंकि ऐसे संस्थानों के पास न तो ढंग की फैकल्टी होती हैं और न ही आधारभूत ढांचा। बरेली के जिस मेडिकल कॉलेज से संबंधित मामले में यह आदेश आया है, वहां भी यही स्थिति थी। जांच में पता चला है कि इस कॉलेज ने मान्यता हासिल करने के लिए फर्जीवाड़ा किया था।
खुद सर्वोच्च अदालत की बेंच ने माना है कि एमबीबीएस और स्नातकोत्तर सीटों में दाखिले के लिए ऐसे संस्थान करोड़ों रुपये वसूल रहे हैं। असल में यह शिक्षा के समान अधिकार की संविधान की मूल भावना के भी खिलाफ है, क्योंकि ऐसी व्यवस्था प्रतिभाशाली गरीब बच्चों को उच्च शिक्षा से वंचित कर देती है।
हैरत है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कैपिटेशन फीस पर रोक लगाने से संबंधित एक विधेयक कैबिनेट की मंजूरी के बाद भी कई वर्षों से लटका हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि टेक्निकल और मेडिकल कॉलेजों में दाखिले की अनैतिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए संसद को जल्द ही कानून बनाना चाहिए।
सवाल है कि जो राजनीतिक वर्ग खुद के चुनावी मंसूबों पर अंकुश लगाने वाले अदालती फैसलों को पलटने के लिए नया कानून लाने को तत्पर हो जाता है, क्या वह इस दिशा में भी कोई कदम उठाएगा?