भाजपा अगर यह समझ रही है कि येदियुरप्पा की पार्टी में वापसी को ज्यादा प्रचारित न कर वह अपयश से बच जाएगी, तो यह उसका भ्रम है। कौन मानेगा कि यह एक मामूली घटना है! येदियुरप्पा की भाजपा में वापसी की भूमिका तो कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद से ही बनने लगी थी।
उस चुनाव में जहां भाजपा तीसरे स्थान पर चली गई थी, वहीं पार्टी से अलग होने के बाद खुद येदियुरप्पा भी सत्ता राजनीति के हाशिये पर सिमट गए थे। राज्य की राजनीति को प्रभावित करने की उनकी क्षमता में भले ही कमी नहीं आई हो, पर बागी होने के बाद वह यह जरूर समझ गए कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। येदियुरप्पा जिस लिंगायत समुदाय के प्रभावी नेता हैं, उसकी कर्नाटक में अट्ठारह प्रतिशत की हिस्सेदारी है। ऐसे में, लोकसभा चुनाव से पहले खुद भाजपा भी उनका साथ चाह रही थी। इसलिए लालकृष्ण आडवाणी के विरोध और अनंत कुमार की शुरुआती आपत्ति के बावजूद येदियुरप्पा की पार्टी में वापसी हुई है।
इसके बाद भाजपा लोकसभा चुनाव में बीस से अधिक सीट जीतने की उचित ही उम्मीद कर सकती है। बल्कि सुगबुगाहट तो खुद येदियुरप्पा के भी शिमोगा से चुनाव लड़ने की है। लेकिन जब भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है, केंद्र की यूपीए सरकार की छवि जब इसी कारण निष्प्रभ हुई है, और जब खुद भाजपा मनमोहन सिंह सरकार के भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुखर है, तब येदियुरप्पा को पार्टी में वापस लाकर वह क्या संदेश दे रही है? यह सफाई गले नहीं उतरने वाली कि येदियुरप्पा राजनीति के शिकार हुए थे।
बल्कि सच्चाई यह है कि खनन घोटाले में उनकी और उनके परिजनों की लिप्तता की बात लोकायुक्त ने रेखांकित की थी, और बाद में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर सीबीआई ने मामले की जांच कर उनके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था। घोटाले में अपनी भूमिका के कारण जेल जाने वाले वह कर्नाटक के पहले मुख्यमंत्री भी बताए जाते हैं। लेकिन चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भाजपा ने जता दिया कि दागियों से परहेज उसे भी नहीं है। जब भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक नवजात राजनीतिक पार्टी की सफलता चकित करती है, तब शुचिता के मुद्दे पर यह दोहरापन भाजपा को भारी पड़ सकता है।