डरबन में पांच ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में ब्रिक्स विकास बैंक, एक आपात कोष और व्यापार परिषद की स्थापना पर बनी सहमति को संकट से जूझ रहे यूरो जोन की अनिश्चितता और अमेरिकी दबदबे के बरक्स आर्थिक आत्मनिर्भता की दिशा में पहलकदमी की तरह देखना चाहिए।
यों यह संगठन पिछले वर्षों तक सालाना बैठक की औपचारिकता या यदा-कदा दबाव समूह के रूप में ही खुद को समेटे हुए था, पर लगता है कि यह अब एक बड़ी आर्थिक और राजनीतिक ताकत के रूप में खड़ा होना चाहता है। वास्तव में ब्रिक्स की जरूरत महसूस ही इसलिए की गई थी, क्योंकि वैश्विक कारोबार से लेकर विश्व आर्थिक मंच तक पश्चिमी देश अपनी मनमर्जी चलाते आए हैं।
विश्व व्यापार संगठन की दोहा दौर की बातचीत अटकी ही इसलिए है, क्योंकि अमीर देश अपने उद्योगों को न केवल संरक्षण देना चाहते हैं, बल्कि विकासशील देशों पर ऐसी नीतियां थोपना चाहते हैं, जिनसे उनका माल यहां के बाजार में खप जाए। खेती के मामले में भी उनकी ऐसी ही दोहरी नीतियां हैं, जिसका खामियाजा विकासशील देशों के किसानों को उठाना पड़ता है।
यही नहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसे संगठनों की नीतियां भी उन्हीं के इशारे पर चलती रही हैं। जबकि वैश्विक कारोबार में ब्रिक्स देशों की 18 फीसदी की हिस्सेदारी है और इनका साझा विदेशी मुद्रा भंडार चार खरब डॉलर को पार कर चुका है। यही नहीं, इनका साझा सकल घरेलू उत्पाद भी न केवल तेजी से बढ़ रहा है, बल्कि अगले डेढ़ दशक में इसके जी-7 जैसे अमीर देशों के संगठन के बराबर होने की संभावनाएं जताई जा रही हैं।
जाहिर है, इन देशों की अधिक दिनों तक उपेक्षा नहीं की जा सकती। ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन में विकासशील देशों के आधारभूत ढांचे के विकास पर जोर दिया गया है, और प्रस्तावित बैंक ऐसी परियोजनाओं में ही मदद करने वाला है। इसके बावजूद ब्रिक्स की कामयाबी इसी पर टिकी है कि कैसे वह खुद को एक सुसंगत संगठन के रूप में मजबूती दे पाता है। इसके लिए जरूरी है कि ब्रिक्स देशों में आर्थिक साझेदारी के साथ ही राजनीतिक समझ भी बढ़े। असल में ब्रिक्स के लिए बाहर से जितनी चुनौतियां हैं, उतनी ही भीतर भी हैं।