अमेरिका के बोस्टन में हुए धमाकों से बंगलूरू में हुए बम विस्फोट की प्रकृति और उसके पीछे के इरादे भले ही अलग हों, पर यह धमाका यह बताने के लिए काफी है कि आतंकवाद की चुनौतियां कम नहीं हुई हैं और इनसे निपटने की हमारी तैयारी पुख्ता नहीं है। बेशक इस धमाके से बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन जैसा कि शुरुआती जांच से इसमें आईईडी के इस्तेमाल की जानकारी मिली है, उससे इसे अंजाम देने वालों के मंसूबों का पता चलता है।
जिस जगह और जिस समय इसे अंजाम दिया गया, वे दोनों ही बातें महत्वपूर्ण हैं। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और बुधवार को वहां नामांकन पत्र भरने की आखिरी तारीख थी, लिहाजा भाजपा मुख्यालय जगन्नाथ भवन में रोज के मुकाबले अधिक आवाजाही थी। मगर इसके पीछे किसी तरह की राजनीतिक साजिश देखने के बजाय यह रेखांकित करने की जरूरत है कि आतंकी जब चाहे और जहां चाहे दहशत फैला सकते हैं।
आखिर दो महीने पहले ही हैदराबाद में दो धमाकों को अंजाम दिया गया था, जिसमें अनेक लोगों की जानें भी गई थीं, और उसके बाद यह धमाका किया गया है, तो इसका साफ मतलब है कि दहशतगर्दों में सुरक्षा तंत्र का किसी तरह का भय नहीं है। ऐसे हर धमाके के बाद या तो खुफिया तंत्र की नाकामी की बात सामने आती है या फिर यह दावा किया जाता है कि समय पर सूचना तो दे दी गई थी, लेकिन राज्य के स्तर पर जरूरी सतर्कता नहीं बरती गई।
केंद्र और राज्य सरकारों के बीच जहां तक समन्वय की बात है, तो इसमें घनघोर अभाव देखा जा सकता है, जिसका एक बड़ा उदाहरण प्रस्तावित आतंकवाद विरोधी केंद्र (एनसीटीसी) है, जिसे लेकर अभी तक किसी तरह की सहमति नहीं बन सकी है। चूंकि कानून व्यवस्था राज्य का मामला है, तो राज्यों को लगता है कि एनसीटीसी के बहाने केंद्र उनके अधिकार क्षेत्र में दखल दे सकता है।
पुलिस और प्रशासनिक सुधारों को लेकर कितनी गंभीरता बरती जा रही है, इसका पता तो इसी से चलता है कि दो दिन पहले इसी सिलसिले में बुलाई गई बैठक में 21 मुख्यमंत्रियों ने तो आना भी जरूरी नहीं समझा! जाहिर है, आतंकवाद से निपटने के लिए कहीं अधिक एकजुट और समन्वित प्रयासों की जरूरत है।