इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के कुछ मैचों में स्पॉट फिक्सिंग के सिलसिले में हुई एस श्रीसंत और दो युवा क्रिकेटरों सहित कुछ फिक्सरों की गिरफ्तारी के बाद क्रिकेट की दुनिया का काला सच एक बार फिर सामने आया है।
हालांकि क्रिकेट में सट्टेबाजी कोई नहीं बात नहीं है और जानकार कहते हैं कि भारत में क्रिकेट में सट्टे का सालाना 2,500 करोड़ रुपयों से भी अधिक का कारोबार होता है। ट्वंटी-20 के आईपीएल तमाशे के शुरू होने के बाद तो लगता है कि यह काले धन को वैध करने का भी बड़ा जरिया बन गया है।
चिंता की बात यह है कि इसके बावजूद न तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और न ही इस खेल से जुड़ी अन्य संस्थाएं सट्टेबाजी और फिक्सिंग को रोक पाने का कारगर तरीका ढूंढ पाई हैं। बल्कि ताजा मामले में दिल्ली पुलिस ने जो दावे किए हैं, उससे तो लगता है कि सटोरिये न सिर्फ आसानी से इन क्रिकेटरों के संपर्क में थे, बल्कि मैदान के भीतर से एक-एक गेंद को लेकर उन्हें कूट संदेश भी मिल रहे थे।
यानी सटोरियों की पहुंच लगातार मैदान के भीतर तक बढ़ती जा रही है। जबकि आईपीएल के ताजा संस्करण के शुरू होने के समय ही इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) की भ्रष्टाचार निरोधक इकाई ने बीसीसीआई को फिक्सिंग को लेकर आगाह किया था। यही नहीं, पिछले वर्ष भी फिक्सिंग का मामला सामने आया ही था, जिसके बाद पांच युवा क्रिकेटरों को प्रतिबंधित किया गया था।
इसके बावजूद कुछ भी नहीं बदला है। निश्चय ही आईपीएल ने युवा क्रिकेटरों को आगे आने का मौका दिया है और उन्हें पैसे भी मिल रहे हैं, इसके बावजूद वे सट्टेबाजी से जुड़ते हैं, तो यह देखने की जरूरत है कि गड़बड़ कहां है? ऐसा नहीं है कि सट्टेबाजी और फिक्सिंग के लिए सिर्फ ट्वंटी-20 का फॉर्मेट जिम्मेदार है, मगर इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इसके साथ जिस तरह से चकाचौंध और ग्लैमर जुड़े हैं, उनका असर युवा खिलाड़ियों पर भी पड़ता होगा।
इस मामले के सामने आने के बाद क्रिकेट विशेषज्ञ हर्षा भोगले ने युवा क्रिकेटरों को खेल के साथ ही नैतिक प्रशिक्षण दिए जाने की भी जरूरत बताई है, जिस पर गौर करना चाहिए। इसके साथ ही उस गठजोड़ को भी तोड़ने की आवश्यकता है, जिसके तार अंडरवर्ल्ड को क्रिकेट से जोड़ते हैं।