जीतन राम मांझी के साथ सीटों के बंटवारे पर भाजपा की अंततः बनी सहमति के बाद बिहार की चुनावी लड़ाई का परिदृश्य स्पष्ट हो गया है, जो पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की प्रेस कॉन्फ्रेंस से भी जाहिर होता है। दो गठबंधनों की इस सीधी लड़ाई में भाजपा सर्वाधिक सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है। जाहिर है, उसके इस दांव में जहां संभावनाएं हैं, वहीं जोखिम भी कम नहीं।
बिहार विधानसभा चुनाव के महत्व से वह बखूबी वाकिफ है, जिसके नतीजे का पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों पर असर पड़ने की बात कही जा रही है। पहले तो तीन राजनीतिक दलों के साथ सीटों के बंटवारे पर सर्वसहमति ही एक बड़ी चुनौती थी, और जीतन राम मांझी की महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगाकर भाजपा ने अपने राजनीतिक चातुर्य का परिचय दिया है। पर मांझी की पार्टी को पहले की तुलना में कुछ अधिक सीटें देने से गठबंधन के दूसरे दलों में यदि असंतोष का थोड़ा भी भाव उभरता है, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। तब तो और भी, जब गठबंधन सहयोगियों की महत्वाकांक्षाएं किसी से छिपी नहीं हैं।
भाजपा की मुश्किल यह है कि वह अपने सहयोगियों को नाराज नहीं कर सकती और एक सीमा से अधिक झुकने का जोखिम भी नहीं उठा सकती। जातियों और संप्रदायों में विभाजित बिहार के चुनावी परिदृश्य में भाजपा को मतदाताओं के ध्रुवीकरण का लाभ मिलेगा, खासकर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के चुनाव में उतरने से यह संभावना और प्रबल ही हुई है।
पर भाजपा अध्यक्ष ने विकास को जिस तरह मुद्दा बनाने की बात कही है, उसका उस बिहार में जरूर महत्व है, जहां विकास का अभी इंतजार है। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री काल में वहां सड़कें बनी हैं और कानून-व्यवस्था में कमोबेश सुधार हुआ है। लेकिन शिक्षा, उद्योग और रोजगार जैसे कई मोर्चे पर व्यापक काम होना अभी बाकी है। लिहाजा विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ने की प्रतिबद्धता जताना तो सही है।
मगर इसका ध्यान रखना होगा कि चुनाव अभियान में नकारात्मकता का कोई बहुत फायदा नहीं होने वाला। बिहार विधानसभा चुनाव को जितना महत्वपूर्ण और केंद्रीय राजनीति तक को प्रभावित करने वाला बताया जा रहा है, उसे देखते हुए लाजिमी है कि इसे उतनी ही गंभीरता से लड़ा जाए।