अमूमन विधानसभा चुनावों का राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में एक सीमित महत्व होता है। मगर, गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों की घोषणा जिन राजनीतिक परिस्थितियों में हुई है, उससे अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि ये चुनाव कांग्रेस और भाजपा के साथ ही पूरे देश के लिए क्यों अहम हो गए हैं। वास्तव में यूपीए-2 का कार्यकाल खासतौर से कांग्रेस के लिए आसान नहीं रहा है, एक-एक कर सामने आए घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों ने उसकी साख पर बट्टा लगाया है, और उसके अपने ही साथी उससे छिटकते जा रहे हैं।
यूपीए सरकार ने भले ही रुके पड़े आर्थिक सुधारों को गति देने की कोशिश की है, मगर बेकाबू महंगाई और खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के फैसले से उपजी आशंकाओं ने कांग्रेस के 'आम आदमी के साथ' वाले उसके नारे पर ही सवाल खड़ा कर दिए हैं। ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने गुजरात में पार्टी का चुनाव अभियान शुरू करते हुए विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही जोर दिया, तो इसे समझा जा सकता है। वरना, 2007 में तो उन्होंने मोदी को 'मौत का सौदागर' तक करार दिया था।
पिछले दो विधानसभा चुनावों में पिट चुकी कांग्रेस, ऐसा लगता है, कि दंगों के मुद्दे से अब पीछे हट रही है। मगर, कांग्रेस की मजबूरी है कि प्रदेश में उसके पास न तो ढंग का संगठन है और न ही नेता। हालांकि सोनिया गांधी के इलाज और विदेश यात्राओं के खर्चों पर सवाल उठाकर नरेंद्र मोदी ने साफ कर दिया है कि उनके निशाने पर कौन होगा। यह किसी से छिपा नहीं है कि भाजपा अपने अंतर्विरोधों और अति महत्वाकांक्षी नेताओं से जूझ रही है, जिनमें एक नाम नरेंद्र मोदी का भी है। मोदी विकास के लाख दावा करें, पर उनके दावे सामाजिक न्याय की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
यह कहना अभी मुश्किल है कि केशुभाई पटेल की मौजूदगी से मोदी को कितना नुकसान होगा और कांग्रेस को कितना फायदा! हालात ऐसे हैं कि हिमाचल विधानसभा चुनाव का भी महत्व बढ़ गया है, जहां भाजपा के सामने सत्ता-विरोधी दबाव के साथ ही अंदरूनी गुटबाजी की चुनौती भी है और कांग्रेस को अंततः वीरभद्र सिंह पर ही भरोसा करना पड़ा है। मगर, यह स्पष्ट है कि इन दोनों राज्यों के चुनाव देश की भावी राजनीति की दिशा तय करने में निर्णायक साबित होंगे।