हाल में कई बड़े फैसले ले चुके वित्त मंत्री लगातार यह जता रहे हैं कि अपनी अर्थव्यवस्था संकट से निकल चुकी है, लेकिन आठ बुनियादी उद्योगों के उत्पादन का एक दशक के निम्नतम स्तर पर पहुंच जाना कुछ और ही कहानी कह रहा है!
बेशक यूरोपीय और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की सुस्ती का असर हमारे उद्योग पर पड़ा है; जब निर्यात मांग न के बराबर है, तो औद्योगिक उत्पादन घटेगा ही। लेकिन वैश्विक मंदी कोई आज से नहीं है। फिर विगत एक साल में ही उद्योगों की स्थिति इतनी खराब क्यों हुई है?
असल में इसके लिए सरकार की नीतियां ही कमोबेश जिम्मेदार हैं, जिस कारण अर्थव्यवस्था को अपेक्षित गति नहीं मिल पा रही। इससे पहले हम देख चुके हैं कि पर्यावरण का अड़ंगा लगाकर कई परियोजनाओं का काम रोका गया, जिससे खनन क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ।
विकसित दुनिया में फैली मंदी के कारण जब पूरा विश्व गहरे दबाव में है, तब सरकार को चाहिए था कि घरेलू अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए वह अतिरिक्त सक्रियता दिखाती। इसके लिए खासकर खाद्यान्नों की जमाखोरी और फिजूलखर्ची पर अंकुश लगाने जैसे तमाम वे कदम उठाए जाने चाहिए थे, जिससे मुद्रास्फीति कम रहे और ब्याज दर को निचले स्तर पर रखा जा सके। तभी उद्योग-धंधों को गति मिल पाती। पर ऐसा हो नहीं पाया।
बल्कि एक ताजा आंकड़ा बताता है कि पिछले पांच वर्षों में कुल मुद्रास्फीति में खाद्य मुद्रास्फीति का हिस्सा बढ़कर 43 प्रतिशत हो गया है। महंगाई पर अंकुश लगाना तो दूर, आय से ज्यादा खर्च करने के कारण जहां राजकोषीय घाटा बढ़ता चला गया है, वहीं घटते निर्यात के दौर में सोने के बढ़ते आयात पर भी अंकुश नहीं लगाया जा सका, जिससे चालू खाते का घाटा बहुत बढ़ गया।
चौतरफा महंगाई और रोजगार क्षेत्र की बदहाली के कारण कारों की बिक्री एक दशक में सबसे कम रह गई है, तो किराया कम होने के बावजूद हवाई यात्रा के प्रति आकर्षण नहीं बढ़ रहा। यानी, चारों ओर बुरा हाल है, पर अपनी विफलताओं को दुरुस्त करने के बजाय सरकार विदेशी निवेश के जरिये विकास दर को ऊपर ले जाने के बारे में सोच रही है। जब अर्थव्यवस्था की स्थिति खराब ही होती जा रही है, तब विदेशी निवेश कैसे आएगा, और उससे भला कितना चमत्कार हो जाएगा!