सर्वोच्च अदालत की फटकार के बाद सरकार ने केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) को राजनीतिक दबावों से मुक्त करने की प्रतिबद्धता जरूर दिखाई है, मगर इस सिलसिले में बनाए गए मंत्रिमंडलीय समूह की सिफारिशें बहुत आश्वस्त नहीं करती हैं। इसी आधार पर सरकार को सर्वोच्च अदालत में हलफनामा देना है और इस पर सुनवाई के बाद ही तस्वीर पूरी तरह से साफ होगी।
इसे स्वतंत्र बनाने के लिए जो मुख्य सुझाव सामने आए हैं, उनके मुताबिक प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और देश के प्रधान न्यायाधीश का कॉलेजियम सीबीआई निदेशक की नियुक्त करे, इसके कामकाज पर सेवानिवृत्त जजों का पैनल निगरानी रखे और वित्तीय फैसले लेने में कार्मिक मंत्रालय पर इसकी निर्भरता कम की जाए। मोटे तौर पर ये ऐसे सुझाव हैं, जिन पर विपक्ष को भी खास आपत्ति नहीं होगी।
मगर इतने भर से सीबीआई की सरकार पर निर्भरता खत्म नहीं हो सकती, क्योंकि उसकी अभियोजन शाखा तो कानून मंत्रालय के अधीन रहकर ही काम करती है। अभी यह स्थिति है कि सीबीआई के निदेशक की नियुक्ति से लेकर, वित्तीय जरूरतों और अभियोजन से जुड़ी प्रक्रिया तक में सरकार का सीधा दखल होता है। कहने को सीबीआई जिन मामलों की जांच कर रही है, उनसे संबंधित प्रगति रिपोर्ट वह सिर्फ अदालत को ही दिखा सकती है, लेकिन कोल ब्लॉक आवंटन के मामले में देखा ही जा चुका है कि इस एजेंसी के कामकाज में किस तरह दखलंदाजी की गई।
यह बात शीर्ष अदालत के संज्ञान में आने और उसके निर्देश देने के बाद ही सरकार की ओर से सीबीआई को 'आजाद' करने की पहल की गई है। यूपीए ही नहीं, पूरे राजनीतिक वर्ग की मंशा साफ होती, तो सीबीआई की आज यह स्थिति नहीं होती। सरकार पर उसके राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप लगते हैं, तो उसकी वजहें भी दिखाई देती हैं। मसलन यूपीए को बाहर से समर्थन दे रहे मुलायम सिंह यादव ने तो खुले तौर पर आरोप लगाया था कि सरकार सीबीआई के जरिये उन पर दबाव बनाती है। मगर हकीकत यह है कि विपक्ष भी सीबीआई के बहाने राजनीतिक हमले करने में पीछे नहीं रहता।
सीबीआई को राजनीतिक दबावों से मुक्त करने के लिए जरूरी है कि उसे भी निर्वाचन आयोग या नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की तरह पूरी तरह से स्वायत्त बनाया जाए। इसके लिए एक व्यापक राजनीतिक सहमति की जरूरत है, जो फिलहाल दिखाई नहीं दे रही।