छह महीने पहले जिस आम आदमी पार्टी से वैकल्पिक राजनीति की उम्मीद दिखी थी, वह आज अपने ही अंतर्विरोधों से त्रस्त है। वैसे तो कई लोग पहले ही पार्टी छोड़ गए हैं, पर अब इसके संस्थापक सदस्यों में से एक और प्रभावी महिला चेहरा शाजिया इल्मी का इस्तीफा कई सवाल खड़े करता है।
उन्होंने और उनके साथ पार्टी छोड़ने वाले कैप्टन गोपीनाथ ने पार्टी नेतृत्व पर जो आरोप लगाए हैं, उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता। यह आरोप कोई पहली बार नहीं लगा है कि पार्टी में फैसले कुछ गिने-चुने लोग ही लेते हैं। जो पार्टी मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था को बदलने की बात करती है, उसमें आंतरिक लोकतंत्र का अभाव क्यों है? मधु भादुड़ी के बाद शाजिया इल्मी भी अगर पार्टी में महिलाओं की अनदेखी का आरोप लगा रही हैं, तो यह गंभीर मामला है।
अरविंद केजरीवाल की ईमानदारी पर किसी को संदेह नहीं है। लोकसभा चुनाव में खासकर दिल्ली में आप का बेहतर प्रदर्शन भी बताता है कि उसे खारिज नहीं किया जा सकता। पर केजरीवाल के फैसले लेने के तौर-तरीके न सिर्फ अप्रत्याशित होते हैं, बल्कि कई बार उनमें भावुकता बटोरने की कोशिश भी होती है।
अपने फैसले को जनता का फैसला बताना, अपनी ही कही बातों से पलट जाना और ठोस यथार्थ से जूझने के समय भावुकता की राजनीति करना एक ऐसी पार्टी के मुखिया को शोभा नहीं देता, जिसका जन्म गतानुगतिक राजनीति को बदलने के लिया हुआ बताया जाता है। मानहानि के मौजूदा मामले में भी मुचलका भरने से इन्कार करने के केजरीवाल के निर्णय के पीछे जनता की भीड़ बटोरने की कोशिश थी, जो सफल होती नहीं दिखती। जब अपने सहयोगियों और कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर पार्टी को दिशा देने की जरूरत है, तब अन्ना हजारे बनने की कोशिश चौंकाती ही ज्यादा है।
यह ठीक है कि राजनीति फूलों की सेज नहीं है। व्यवस्था बदलने की जिस मुहिम को वह दिशा दे रहे हैं, वह तो वैसे भी बहुत जोखिम भरी है। इससे भी इन्कार नहीं कि विपत्ति के समय ही निष्ठा और प्रतिबद्धता की असली पहचान होती है। पर नेतृत्व को याद रखना चाहिए कि विवादों और आरोपों से पार्टी का नुकसान तो हो ही रहा है, ईमानदार और पारदर्शी राजनीति की चाह रखने वालों की उम्मीदें भी खत्म हो रही हैं।