राजधानी में पैरा मेडिकल छात्रा के साथ हुई सामूहिक बलात्कार की बर्बर घटना के बाद महिलाओं की सुरक्षा के साथ ही कानून और व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। मगर यह विडंबना ही है कि इस घटना के बाद जब देश में पुलिस सुधार, कड़े कानून और त्वरित न्याय को लेकर तीखी बहस चल रही है, तब बलात्कार और यौन उत्पीड़न के लिए महिलाओं को ही कठघरे में खड़ा किया जा रहा है।
इस क्रम में ताजा नाम संत आसाराम बापू का है, जिन्होंने सामूहिक बलात्कार की घटना के लिए दिवंगत छात्रा को भी दोषी ठहरा दिया है! वह बेबस छात्रा जिन दरिंदों से घिरी हुई थी, वे अब कानून से बच निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं, मगर आसाराम बापू को लगता है कि वह उन्हें भाई बनाकर बच सकती थी।
उन्होंने जो कुछ कहा है वह न केवल गैरजिम्मेदाराना है, बल्कि उस मानसिकता को भी उजागर करता है, जिसका शिकार अक्सर महिलाओं को होना पड़ता है। उनसे पहले भाजपा के कुछ नेताओं और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत भी महिलाओं को संस्कृति और पारिवारिक जिम्मेदारी का पाठ पढ़ा चुके हैं।
जनता दल (यू) के नेता शरद यादव ने बलात्कार और यौन उत्पीड़न की घटनाओं की जो व्याख्या की है, उसने तो उन्हें खाप पंचायतों के करीब ही ला खड़ा किया है। दरअसल यह वह सोच है, जो महिलाओं की आत्मनिर्भरता और उनकी स्वतंत्र सोच को स्वीकार नहीं कर पा रही है। यह स्थिति तब है, जब भारत की तीस फीसदी से भी कम महिलाएं किसी रोजगार से जुड़ी हुई हैं।
दिल्ली की घटना को लेकर कटाक्ष करने वाले चीन में यह आंकड़ा 70 फीसदी से ऊपर है। महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों की एक बड़ी वजह यह है कि अपराधियों में किसी तरह का खौफ नहीं रहा। इसका सुबूत है कि दिल्ली की घटना के बाद भी ऐसे मामले कम नहीं हुए हैं।
ऐसे में पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एम एन वेंकटचलैया के इस सुझाव पर गौर किया जा सकता है कि अपराध सजा होने के डर से रुकते हैं, न कि सजा की कठोरता से। जाहिर है, महिलाओं की सुरक्षा और उनकी अस्मिता की लड़ाई सिर्फ कानूनों से नहीं लड़ी जा सकती। इसके लिए समाज को भी बदलना होगा।