अब्दुल करीम टुंडा की गिरफ्तारी के पखवाड़े भर के भीतर इंडियन मुजाहिदीन के सह-संस्थापक यासीन भटकल का अपने एक साथी के साथ पकड़ा जाना आतंकवाद के खिलाफ जंग में हमारी एक बड़ी सफलता तो है ही, भारत-नेपाल सीमा पर जिस गोपनीय तरीके से उन्हें शिकंजे में कसा गया है, उसे हमारे खुफिया तंत्र की एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर भी देखना चाहिए।
भटकल की गिरफ्तारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि पिछले करीब पांच वर्षों से फरार चल रहा इंडियन मुजाहिदीन का यह शीर्ष आतंकवादी पिछले साल दो बार शिकंजे में फंसने से बाल-बाल बचा था। घटनाएं गवाह हैं कि अपने गठन के बाद से ही इंडियन मुजाहिदीन पाक प्रायोजित दूसरे आतंकवादी संगठनों की तुलना में ज्यादा खतरनाक साबित हुआ। एक तो इसके तहत पहली बार देश भर में ऐसे आतंकियों का एक व्यापक नेटवर्क तैयार हुआ, जो यहीं के पढ़े-लिखे नौजवान थे। इसके अलावा शहरी भारत में सिलसिलेवार हमले इसकी सुनियोजित योजनाओं का हिस्सा रहे हैं। दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश, मुंबई, अहमदाबाद, जयपुर, पुणे, बंगलूरू और हैदराबाद तक में इस आतंकवादी संगठन ने बीते कुछ वर्षों में अपनी खतरनाक योजनाओं को अंजाम दिया, तो सुदूर दरभंगा तक में इसके गोपनीय ठिकाने इसकी मजबूत पैठ के ही सुबूत हैं।
पिछले दिनों बिहार में बोधगया के महाबोधि मंदिर में हुए विस्फोटों में भी इंडियन मुजाहिदीन का हाथ बताया गया, जो इसके लगातार प्रभावी बने रहने का ही उदाहरण है। शिकंजे में फंसने के बाद भटकल से इंडियन मुजाहिदीन के तंत्र, दूसरे आतंकी संगठनों से उसके रिश्ते और उसकी खतरनाक योजनाओं के बारे में गोपनीय जानकारी हासिल की जा सकेगी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इंडियन मुजाहिदीन ने देश भर में जिस तरह अपनी जड़ जमाई है, और इससे जुड़े कई बड़े आतंकी जिस तरह पकड़ से बाहर हैं, उसे देखते हुए यह मान लेने का कोई मतलब नहीं है कि भटकल की गिरफ्तारी से यह आतंकी संगठन निष्क्रिय हो जाएगा। बल्कि भारत-नेपाल सीमा पर आतंकियों की हो रही गिरफ्तारी से आतंकवाद के एक केंद्र के उभरने की ही आशंका पैदा हो रही है। अलबत्ता इस सफलता के बाद आतंकवाद के खिलाफ जंग में हमारा हौसला तो बुलंद हुआ ही है।