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भ्रष्टाचार के विरुद्ध

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फुटबॉल की विश्व संस्था फीफा के कई वरिष्ठ अधिकारियों की भ्रष्टाचार के मामले में हुई गिरफ्तारी की पृष्ठभूमि में इसके अध्यक्ष पद का चुनाव इस बार जितना महत्वपूर्ण था, उतना संभवतः इसके इतिहास में इससे पहले कभी नहीं हुआ होगा।
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सिर्फ यही नहीं कि फुटबॉल का चलन और विश्व भर में उसके प्रशंसकों की संख्या किसी भी दूसरे खेल की तुलना में अधिक है, यह भी कि फीफा दुनिया के सबसे अमीर और विशाल खेल संगठनों में से है। ऐसे एक खेल संगठन के वरिष्ठ अधिकारियों पर धोखाधड़ी और मनी लांड्रिंग जैसे इतने गंभीर आरोप लगे हैं, जो अगर साबित हो गए, तो आरोपियों को कम से कम बीस साल की सजा होगी।

अगर यह सच है कि कई अयोग्य देशों, मसलन कतर, को सिर्फ पैसों के एवज में विश्व कप की मेजबानी दे दी गई, तो समझा जा सकता है कि ऐसे एक प्रतिष्ठित आयोजन के प्रति इसके नीति-नियंताओं का क्या रवैया था। अगर अमेरिका ने भ्रष्टाचार के इस मामले की जांच में पहल न की होती, तो सेप ब्लाटर जैसे लोग अब भी फीफा को पाक-साफ बताने के अपने पुराने हथकंडे में कामयाब हो गए होते। लेकिन फीफा के एकाधिक वरिष्ठ अधिकारियों की गिरफ्तारी ने इसकी वह सच्चाई सामने ला दी है, जिस बारे में इससे पहले कयास ही लगाए जाते थे।
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ऐसे में, आने वाले दिनों में फीफा जैसे संगठन को साफ-सुथरा बनाए रखने की चुनौती ही अपने आप में बहुत बड़ी होगी। इसके अलावा दुनिया भर में फुटबॉल को लोकप्रिय बनाते हुए उस पक्षपात भरी नीति से भी बचना होगा, जिसकी शुरुआत कभी जोओ हैवेलेंस ने की थी, और जिसे सेप ब्लाटर ने भी बदस्तूर जारी रखा। इसके तहत अफ्रीका और एशिया के छोटे देशों में फुटबॉल को बढ़ावा देने की नीति अपनाई गई, जिसका असली मकसद दरअसल फीफा में अपना साम्राज्य बचाना था।

उम्मीद करनी चाहिए कि यह चुनाव फीफा में नई शुरुआत करने का अवसर बनेगा। एक खेल के रूप में फुटबॉल की दुनिया भर में जितनी लोकप्रियता है, उतनी कम ही खेलों की होगी। अपने निहित इरादों की पूर्ति के लिए फुटबॉल की छवि खराब करने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।
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