सहिष्णुता और सांस्कृतिक वैविध्य पर संकट की बात कहकर वयोवृद्ध लेखिका नयनतारा सहगल और कवि-संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाने का जो फैसला किया है, उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। इसलिए भी नहीं कि एम एम कलबुर्गी की हत्या के बाद ऐसी टिप्पणियां करते हुए हिंदी लेखक उदय प्रकाश ने साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा की थी। ऐसा ही कदम कन्नड़ के छह साहित्यकारों ने राज्य सरकार के पुरस्कार लौटाते हुए उठाया था।
हालांकि नयनतारा सहगल को जानने वाले उचित ही सवाल कर रहे हैं कि जवाहरलाल नेहरू की जिस भांजी ने आपातकाल का घोर विरोध किया था, उन्होंने 1984 की हिंसा के दो वर्ष बाद राजीव गांधी सरकार के समय साहित्य अकादेमी पुरस्कार लेने से इन्कार क्यों नहीं किया था। पर नयनतारा सहगल को निशाना बनाकर साहित्यकारों के इस प्रतीकात्मक विरोध की अनदेखी नहीं की जा सकती। यह ठीक है कि हर सत्ता का कमोबेश एक जैसा चरित्र होता है, और वे अपनी ही वैचारिकता को बढ़ावा देने का काम करती हैं।
पर पिछले कुछ समय से समाज को ध्रुवीकृत करने की कोशिशें जिस तरह बढ़ी हैं और तर्कवादियों को जिस तरह निशाना बनाया जा रहा है, वह चिंतनीय है। जो देश आज दुनिया का सिरमौर बनने जा रहा है, वहां यह तर्क नहीं चल सकता कि असहिष्णुता के ऐसे दृश्य पहले भी देखे जाते थे। पिछले दिनों बिसाहड़ा गांव में इकलाख की जिस तरह हत्या कर दी गई, वही स्तब्ध करने वाली घटना थी।
पर इस दौरान प्रधानमंत्री की चुप्पी के बीच राजनेताओं की गैरजिम्मेदार टिप्पणियां, जिनमें उनकी पार्टी के नेता भी हैं, आशंकित करती हैं। गुलाम अली के कार्यक्रम के विरोध में उतरी शिवसेना, फरहान अख्तर को पाकिस्तानी कहने की मानसिकता और गरबा में गैरहिंदुओं को घुसने न देने की घोषणा इसी असहिष्णुता के ताजा उदाहरण हैं।
प्रेमचंद ने साहित्य को राजनीति के आगे जलने वाली मशाल कहा था, और साहित्यकार इसी तरह से अपना विरोध दर्ज कर सकता है। पर इन चीजों का जनता से सरोकार हो, तभी फर्क पड़ता है। साहित्यकारों का यह फैसला समाज को आलोड़ित करे, उन्हें संवेदनशील बनाए, तभी इस प्रतीकात्मकता का अर्थ है।