जब सत्ता राजनीति में भ्रष्टाचार चकित और क्षुब्ध नहीं करता, तब एक बिल्डर से छह लाख रुपये रिश्वत लेने का मामला सामने आने पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा अपने मंत्री आसिम अहमद खान को पद से हटा देने का फैसला ध्यान खींचता है। यह बात मायने नहीं रखती कि भ्रष्टाचार का यह मामला अभी का है या पुराना, इसका भी बहुत मतलब नहीं कि मंत्री ने छह लाख रुपये लिए थे या अधिक।
जो बात मायने रखती है, वह यह है कि खुद मुख्यमंत्री ने एक संवाददाता सम्मेलन आयोजित करके अपने मंत्री की करतूत के बारे में बताया, और उनके खिलाफ कार्रवाई के बारे में भी। हालांकि राजनीति को बदलने के लिए जो पार्टी बनी, और विगत फरवरी में भारी बहुमत के साथ दोबारा दिल्ली की सत्ता में लौटी, आठ महीने के भीतर उसके दो मंत्रियों के फर्जीवाड़े और भ्रष्टाचार में, तथा एक विधायक के पत्नी के साथ बदसुलूकी के इल्जाम में फंसने से 'बदलाव' का भरोसा टूटा है। केजरीवाल के तानाशाही तौर-तरीके से भी अच्छा संदेश नहीं जाता।
आसिम अहमद खान को हटाए जाने के बारे में भी कहा जा रहा है कि उन्होंने वाहवाही हासिल करने के लिए अपने तौर पर यह फैसला लिया। सवाल यह भी है कि इस तरह वे और कितने विधायकों-मंत्रियों को बाहर करेंगे। इन घटनाओं से उन लोगों का विश्वास दरक रहा है, जो आप के उदय से राजनीति के एक साफ-सुथरे, ईमानदार विकल्प की उम्मीद कर रहे थे। पर यह भी सच है कि आप ने कम समय में ही कई ऐसे फैसले लिए हैं, जिनकी कल्पना दूसरी राजनीतिक पार्टियों से नहीं की जा सकती, चाहे वह जनलोकपाल विधेयक पारित न होने की स्थिति में केजरीवाल का इस्तीफा देना रहा हो या अब अपने भ्रष्ट मंत्रियों-विधायकों को संरक्षण न देना। आसिम अहमद खान को हटाकर केजरीवाल ने भाजपा और कांग्रेस के सामने नैतिक चुनौती तो पेश कर ही दी है।
क्या भाजपा भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे शिवराज सिंह चौहान तथा वसुंधरा राजे और कांग्रेस वीरभद्र सिंह के खिलाफ ऐसा कदम उठाएंगी? पर भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई का साहस छोड़िए, यहां तो केजरीवाल के इस फैसले की प्रशंसा करने की मानसिकता तक विपक्षी पार्टियों में दिखाई नहीं देती।