तीसरा मोर्चा गठित करने की कवायदें ज्यादातर विफल ही हुई हैं, इसके बावजूद लोकसभा चुनाव से पहले इस तरह का एक मोर्चा अगर फिर से बनने की राह पर है, तो इसकी पहल करने वालों के साहस की दाद देनी चाहिए! सिर्फ यही नहीं कि केंद्र में गैरकांग्रेस-गैरभाजपा की सरकार बनाने को इच्छुक यह गठजोड़ अभी खुद को तीसरा मोर्चा कहने की जल्दबाजी में नहीं है, बल्कि आगामी पांच फरवरी से शुरू हो रहे सत्र में इन्होंने संसद के भीतर आपसी तालमेल बनाने का संकेत भी दिया है।
यह ठीक है कि इस मोर्चे में शामिल होने वाले दलों के बीच कोई बड़ी प्रतिस्पर्धा नहीं है। इसके बावजूद इस जमावड़े के प्रति निश्चय के साथ कुछ कहा नहीं जा सकता! अभी न तो इसका स्वरूप तय है और न ही इन दलों की प्रतिबद्धता के बारे में ठोक-बजाकर कुछ कहा जा सकता है।
मसलन, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह केंद्र में सरकार बनाने का संकेत तो देते रहे हैं, लेकिन अगले चुनाव के बाद वह कांग्रेस को समर्थन नहीं करेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। सवाल यह भी है कि अखिलेश सरकार के अब तक के प्रदर्शन को देखते हुए क्या सपा लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से इतनी सीटें जीत पाएगी कि प्रस्तावित तीसरे मोर्चे में प्रभावी भूमिका निभा सके।
इसी तरह नीतीश कुमार कांग्रेस से धोखा खाने के बाद मजबूरी में ही इस मोर्चे में आए हैं और भाजपा से अलग होने के बाद लोकसभा चुनाव में उनके लिए भी कठिन चुनौती होगी। बीजद, रालोद और जनता दल जैसी पार्टियों से बड़ी भूमिका निभाने की बहुत उम्मीद नहीं है।
जिन स्थानीय क्षत्रपों की लोकसभा चुनाव में बेहतर संभावनाएं बताई जा रही हैं, उनमें सिर्फ जयललिता ही इस प्रस्तावित तीसरे मोर्चे में हैं। लेकिन चुनाव के बाद भाजपा के नेतृत्व वाला राजग अगर केंद्र में सरकार बनाने की स्थिति में होता है, तो अम्मा उसके साथ नहीं होंगी, यह कौन कह सकता है?
सिर्फ वाम दल ही ऐसे हैं, जिनकी प्रतिबद्धता के बारे में निश्चय के साथ कहा जा सकता है। लेकिन हाशिये पर रह गए कम्युनिस्ट लोकसभा चुनाव में ऐसा क्या कर लेंगे, जिससे वे दूसरे समानधर्मा दलों को अपने साथ जोड़ सकें? लिहाजा यह पहलकदमी तो ठीक है, लेकिन इससे बहुत उम्मीद नहीं बनती।