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फिर बारिश का कहर

Tue, 31 Mar 2015 08:05 PM IST
नई दिल्ली
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पिछले कुछ महीनों से जारी राजनीतिक उथलपुथल से गुजरने के बाद अब जम्मू-कश्मीर के लोगों को बारिश और बाढ़ के कहर से जूझना पड़ रहा है। यों तो उत्तर भारत सहित देश के अनेक राज्यों में इस वर्ष मार्च के महीने में हुई बारिश ने गेहूं और आलू सहित अनेक फसलों को खासा नुकसान पहुंचाया है। मगर जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए यह छह-सात महीने के भीतर दोहरी मार है।
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पिछले वर्ष सितंबर में आई बाढ़ ने राज्य की मानो कमर ही तोड़ दी थी। लाखों लोगों को बेघर होना पड़ा था और उस समय जो तबाही हुई थी, उससे आज तक यह सूबा उबर नहीं पाया है। अलबत्ता इस बार बारिश ने वैसी तबाही नहीं मचाई है, लेकिन उत्तरी कश्मीर के कई हिस्सों में झेलम में पानी अब भी खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है। बाढ़ और बारिश के कारण 15 से अधिक लोगों के मरने की खबर यही बताती है कि इंतजाम पूरी तरह से पुख्ता नहीं हैं। पिछले वर्ष हुई तबाही के समय ही इस खूबसूरत राज्य के नियोजन को लेकर सवाल उठे थे कि किस तरह बेतरतीब तरीके से हो रहे शहरीकरण और जंगलों की कटाई के कारण झीलों और नदियों में गाद जमा हो रही है, जिससे पानी की निकासी के लिए रास्ते तंग होते जा रहे हैं।

पिछले दो दिनों में हुई बारिश ने एक बार फिर दिखा दिया है कि यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो इस राज्य की सूरत बिगड़ जाएगी। वास्तव में हाल के वर्षों में पूरे हिमालय क्षेत्र में परिस्थितियां तेजी से खतरनाक होती जा रही हैं, लेकिन लगता है कि हम प्रकृति के संकेतों को ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं। लद्दाख में 2010 में आई बाढ़ हो, या फिर 2013 में उत्तराखंड में हुई भारी तबाही या फिर पिछले वर्ष जम्मू-कश्मीर में बाढ़ का कहर, यह इस क्षेत्र में प्रकृति के साथ हमारे बिगड़ते संतुलन की ओर ही इशारा है।
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निश्चय ही, मौसम की भविष्यवाणी करने में और प्राकृतिक आपदा से जूझने में हमारा तंत्र पहले से बेहतर हुआ है। मगर जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड जैसे राज्यों में पर्यटन जिस तरह उद्योग बनकर उभरा है, उससे भी मुश्किलें खड़ी हुई हैं, क्योंकि नियमों को ताक पर रखकर वहां अंधाधुंध तरीके से निर्माण किए जा रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं कि राहत कार्य चलाने और जलवायु परिवर्तन की बहसों के बीच इन राज्यों के नियोजन को लेकर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
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