संघर्ष विराम की अनदेखी और नियंत्रण रेखा का उल्लंघन कर पाकिस्तानी सेना ने पहले बर्बरता की हद पार की, तो अब इस्लामाबाद न सिर्फ उस घटना से पल्ला झाड़ने की कोशिश में लगा है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र से जांच कराने का दांव चलकर मामले के अंतरराष्ट्रीयकरण की पुरानी आदत का भी परिचय दे रहा है।
पाकिस्तान के साथ क्रिकेट शृंखला खत्म होने के तत्काल बाद और वीजा नीति को व्यापक और आसान बनाने की पृष्ठभूमि में सीमा पार से हुई यह बर्बरता बेशक नई नहीं है; इससे पहले दिल्ली-लाहौर बस सेवा शुरू करने के बाद कारगिल हुआ ही था। जम्मू-कश्मीर के मेंढर में हुई यह आक्रामकता उसी तरह सरकार पर सैनिक वर्चस्व कायम करने की कोशिश लगती है।
भारत-पाक संबंध जब पटरी पर लौटते दिखाई दे रहे थे, तभी यह करतूत सामने आई है। पिछले कुछ समय से सीमा पर तनातनी जरूर बढ़ी है, लेकिन उस पार से घुसपैठ कम हुई है, और पाक प्रायोजित आतंकवादी संगठन भी कमोबेश वजूद खोते दिखते हैं। वहां के कट्टरवादियों को क्षुब्ध करने के लिए मानो यही काफी न हो, पिछले दिनों यह भी स्वीकारा गया कि पाकिस्तान को भारत की तुलना में आंतरिक आतंकवाद से ज्यादा खतरा है।
सेवा विस्तार पर चल रहे पाक सेनाध्यक्ष कियानी पर पद छोड़ने का दबाव है, और वह इस तरह की भारत-विरोधी दुस्साहसिकता से ही अपना वर्चस्व बनाए रख सकते हैं। अगर उन्होंने कहा है कि पाकिस्तान किसी भी धमकी का सामना करने के लिए तैयार है, तो इससे शांति प्रक्रिया को पटरी से उतारने की पाक सेना की मंशा समझ में आती है। हैरत देखिए, अमानवीयता का परिचय देने के बाद भी पाक विदेश मंत्री तल्ख स्वर में भारतीय मीडिया को सीख लेने का उपदेश देती हैं!
तो क्या भारत को अब पाकिस्तान से संयम बरतना सीखना पड़ेगा? पाक दुस्साहस का जवाब बेशक आक्रामकता नहीं है, न ही बेहतरी के लिए उठाए गए कदमों को वापस लेना दूरदर्शिता है। पर पाक से जवाब मांगने और अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर यह मामला उठाने के अलावा सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था को सख्त करना पड़ेगा। यही नहीं, संघर्षविराम को उसकी समग्रता में लागू करने के लिए पाकिस्तान पर दबाव बनाने की भी जरूरत है।