बस्तर के तीन जिलों में तीन दिन के भीतर तकरीबन तीन सौ किलोमीटर के दायरे में हुए चार नक्सली हमले सुरक्षा और खुफिया बलों की तुलना में माओवादियों की मजबूत रणनीति को ही रेखांकित करते हैं। हैरत की बात यह है कि सुरक्षा बलों ने कुछ दिन पूर्व ही बस्तर में सशस्त्र मॉक ड्रिल भी की थी, इसके बावजूद ये हमले रोके नहीं जा सके।
यदि इन हमलों के पैटर्न को देखें, तो पता चलता है कि सुकमा जिले के दोरनापाल क्षेत्र में घात लगाए बैठे नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ विशेष बल के जवानों को निशाना बनाया, कांकेर जिले में लौह अयस्क ढोने वाले डेढ़ दर्जन से अधिक वाहन फूंक दिए और दंतेवाड़ा जिले में एक एंटी लैंडमाइन व्हीकल को धमाके से उड़ा दिया। यानी हर जगह नक्सलियों ने अलग ढंग से नुकसान पहुंचाया। माओवादियों को 40, 000 वर्ग किलोमीटर में फैले इन घने जंगलों वाले दुर्गम क्षेत्र के विकास वगैरह से कोई लेना-देना नहीं है और वे ऐसी हर कोशिश को ध्वस्त करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। जैसा कि एंटी लैंडमाइन व्हीकल को उड़ाकर उन्होंने दिखाया है, जिसे एक निर्माण कार्य के सिलसिले में ही वहां भेजा गया था।
मगर इसके बावजूद यह भी सच है कि माओवादियों से सिर्फ सशस्त्र या सैन्य कार्रवाई जैसे कदमों से ही नहीं निपटा जा सकता, वहां असैन्य मानवीय पहलों की भी उतनी ही जरूरत है। नक्सली सड़कें, स्कूल और अस्पताल वगैरह बनाने नहीं देते, लेकिन इसके लिए आदिवासियों का विश्वास जीतने और उन्हें साथ जोड़ने की जरूरत है, ऐसी पहलों में अक्सर सरकारें पीछे रह जाती हैं। ऐसे उदाहरण भी कम नहीं हैं, जब निर्दोष आदिवासियों को नक्सल समर्थक बताकर उनका उत्पीड़न किया गया।
बड़ा सवाल तो यही है कि जिस राज्य का गठन ही आदिवासियों की एक तिहाई से अधिक आबादी के कारण हुआ, डेढ़ दशक बाद भी वहां उनकी स्थिति इतनी बदतर क्यों है? आखिर उन्हें बंदूक के साये में क्यों रहना चाहिए और वह भी तब, जब वहां से निरंतर खबरें आ रही हैं कि वहां हर चुनाव में वोट प्रतिशत बढ़ता जा रहा है। वास्तव में जरूरत इस बात की है कि न केवल आदिवासियों का विश्वास जीतने की कोशिश की जाए, बल्कि उन पर भी विश्वास किया जाए।