संप्रग-2 की महत्वाकांक्षी आधार योजना की वैधानिकता को लेकर शुरू से सवाल उठते रहे हैं और अब सर्वोच्च अदालत ने भी राज्य सरकारों को नोटिस भेजकर इसकी वैधता पर उनकी राय मांगी है। हैरत की बात है कि बिना किसी सांविधानिक आदेश के इसे न केवल लागू कर दिया गया, बल्कि अनेक राज्य सरकारों द्वारा कई सरकारी योजनाओं की पात्रता के लिए इसे अनिवार्य भी कर दिया गया।
हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले दिनों अपने एक अंतरिम आदेश के जरिये इसकी अनिवार्यता खत्म कर दी है, मगर जब से यह योजना अस्तित्व में आई है, इसे लेकर भ्रम की स्थिति बनी रही है। इसे ऐच्छिक बताया गया था और दावा किया गया था कि इसका मकसद लोगों की पहचान करना है, ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ सही लोगों को मिल सके। मगर दिल्ली, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे अनेक राज्यों में सरकारी कर्मचारियों के वेतन से लेकर स्कूल-कॉलेज में दाखिले और खाद्य सुरक्षा का लाभ लेने तक के लिए इसे अनिवार्य कर दिया गया।
दूसरी ओर राष्ट्रीय जनसंख्या पंजीयक के जरिये भी बायोमैट्रिक पहचान दर्ज कर ऐसी ही कवायद की जा रही है। वास्तव में बायोमैट्रिक पहचान को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, क्योंकि इससे व्यक्ति की निजी जानकारियों के गलत हाथों में पड़ जाने का खतरा है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए निजता के अधिकार का हनन है।
आधार कार्ड तैयार करने का ठेका निजी कंपनियों को दिया गया है, जिससे इन आशंकाओं को बल मिलता है कि वे अपने व्यावसायिक हित के लिए गोपनीय जानकारियों का दुरुपयोग कर सकती हैं। यही नहीं, ऐसी जानकारियां देश की सुरक्षा के लिहाज से भी अहम हो सकती हैं।
आधी-अधूरी तैयारियों के साथ न केवल सरकार ने आधार को आगे बढ़ाया, बल्कि वह आगामी लोकसभा चुनाव से पहले कैश सब्सिडी से इसे सीधे जोड़ने को भी उतावली दिखती है। ऐसा लगता है कि वह कानूनी पेचीदगियों से बचने के लिए संसद के शीतकालीन सत्र में 'आधार' को वैधानिक जामा पहनाने के लिए विधेयक भी ला सकती है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश के नागरिकों और जरूरतमंद लोगों को सरकारी सुविधाओं का लाभ मिलना चाहिए, मगर ऐसी किसी पहल के पीछे राजनीतिक मकसद नहीं होना चाहिए।