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थर्ड-पार्टी रिप्रोडक्शन आजमाने से पहले ये जरूर जान लें

Tue, 28 Apr 2015 05:55 PM IST
टीम डिजिटल / अमर उजाला, दिल्ली
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बेतरतीब लाइफ स्टाइल का असर फर्टिलिटी पर भी पड़ रहा है। ऐसे में थर्ड-पार्टी रिप्रोडक्शन का चलन तेजी से बढ़ा है। लेकिन, इसको लेकर कई तरह के सवाल भी हैं, जिनके जवाब जानना बेहद जरूरी है।
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थर्ड-पार्टी रिप्रोडक्शन यानी किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा दान में दिए गए डिम्ब, शुक्राणु, भ्रूण या गर्भ (सरोगेसी) के माध्यम से इनफर्टाइल व्यक्ति या दम्पति को माता-पिता बनने में सक्षम बनाना। आमतौर पर प्रजनन के इस तरीके पर तभी विचार किया जाता है, जब इस तकनीक के बिना गर्भाधान की कोई उम्मीद बाकी नहीं रह जाती।

थर्ड-पार्टी रिप्रोडक्शन का विचार करने वाले दम्पति डोनर स्पर्म, डोनर ऐग, डोनर ऐम्ब्रयो व सरोगेसी के विषयों पर व्यापक जानकारी व अनुभव रखने वाले डॉक्टरों एवं स्टाफ से इस प्रक्रिया को समझ सकते हैं।
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जीवनसाथी की सहमति के बिना न आजमाएं

नई दिल्ली के फरि्टलिटी कंसल्टेंट डॉ. सोनू तलवार के मुताबिक ′थर्ड-पार्टी रिप्रोडक्शन से कई मरीजों को संतान प्राप्त करने का अवसर मिलता है। इस विकल्प को चुनते समय ध्यान रखें कि असिस्टेड रिप्रोडक्टिव तकनीक (आर्ट) की कोई भी प्रक्रिया जीवनसाथी की सहमति के बिना न आजमाएं।

फर्टिलाइजेशन के बाद किसी भी स्तर पर लिंग चयन या लिंग के भ्रूण का गर्भपात नहीं किया जा सकता। आईवीएफ प्रक्रिया के जरिए दात्री की डिम्बग्रंथियों से डिम्ब प्राप्त किए जाते हैं और प्राप्तकर्ता को दिए जाते हैं। गर्भाधान होता है, तो प्राप्तकर्ता महिला का शिशु के साथ जैविक संबंध तो होगा, किंतु आनुवांशिक नहीं।

यदि शुक्राणु उसके पति का है, तो वह जैविक और आनुवांशिक दोनों तरह से बच्चे से संबंधित होगा। डिम्ब दान करते वक्त ध्यान दें कि एचआईवी और हेपेटाइटिस बी एवं सी संक्रमण न हो। इसी के साथ हाइपरटेंशन, मधुमेह, यौन संक्रमित रोग, पहचानने योग्य और सामान्य आनुवांशिक विकार जैसे थैलेसीमिया, ब्लड ग्रुप और आरएच स्टेटस का पता करके रिकॉर्ड में दर्ज करना चाहिए।
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