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वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डेः हर साल सवा लाख लोगों को लील रहा डिप्रेशन

Wed, 10 Oct 2012 11:41 AM IST
मुरादाबाद/ब्यूरो
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लगातार बदलता लाइफस्टाइल, अपेक्षाओं का बोझ, जिम्मेदारियों को तेजी से पूरा करने की ललक, आगे बढ़ने की होड़- ये ऐसे कारक हैं जो समाज में डिप्रेशन को बढ़ावा दे रहा है। मानसिक समस्याओं के बढ़ते मामलों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन हर साल 10 अक्टूबर को वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे मनाता है।
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1992 में अमेरिकी डाक्टर रिचर्ड हंटर की पहल पर हर साल दस अक्टूबर को वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे के रूप में मनाने की शुरुआत की गई। वर्ल्ड फेडरेशन फार मेंटल हेल्थ के आंकड़ों पर यदि नजर डाले तो भारत में डिप्रेशन की बीमारी तेजी से बढ़ रही है। वर्तमान में व्यस्कों में इस बीमारी का प्रतिशत दस से पंद्रह तक है जबकि पांच से दस प्रतिशत बच्चे भी डिप्रेशन का शिकार हैं। किशोरों में ये बीमारी ज्यादा तेजी से फैलती है। आत्महत्या करने वालों में अस्सी प्रतिशत संख्या किशोरों की होती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, महिलाओं में अवसाद की बीमारी ज्यादा तेजी से असर दिखाती है। यदि यही हालात रहे तो 2030 में डिप्रेशन की बीमारी सबसे ज्यादा मारक रूप में सामने आएगी।
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यूपी में मात्र डेढ़ सौ डॉक्टर
मानसिक अवसाद को लेकर समाज में जागरूकता ही नहीं है। फेडरेशन के आंकड़ों के अनुसार दस में से नौ रोगियों को पता ही नहीं चल पाता कि वे मानसिक अवसाद की स्थिति से गुजर रहे हैं। सरकार भी अभी तक इस ओर गंभीर प्रयास नहीं कर रही है। हालात यह है कि देश में मात्र पांच हजार व उत्तर प्रदेश में मात्र डेढ़ सौ ही मनोचिकित्सक हैं। मुरादाबाद मंडल की बात करें तो रामपुर, बिजनौर जिले में मनोचिकित्सक हैं ही नहीं।
 
डॉक्टरों के पास जाने की झिझक टूटना जरूरी
आमतौर पर मनोचिकित्सक के पास जाने से कतराते हैं। सामाजिक धारणा है कि मनोचिकित्सक के पास जाने वाला व्यक्ति का दिमागी संतुलन थोड़ा बिगड़ जाता है लेकिन ये धारणा गलत है। मनोचिकित्सक डॉ. नीरज गुप्ता कहते हैं हम मात्र रोगी को डिप्रेशन से निकालने का काम करते हैं। इसका पागलपन से कोई संबंध नहीं होता है। इस धारणा को तोड़ने के लिए बड़ा अभियान चलाए जाने की जरूरत हैं।
 
पहचानें डिप्रेशन के लक्षण
हमारे व्यवहार में आने वाले बदलावों को अक्सर हम पहचान ही नहीं पाते और कब डिप्रेशन से घिर जाते हैं। ऐसे में व्यवहार में अगर इस तरह के बदलाव आएं तो इन्हें डिप्रेशन के लक्षण मान सकते हैं।
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- रोगी की दिनचर्या में बदलाव होना।
- अनिद्रा की स्थिति।
- लगातार परेशानी, थकान महसूस करना।
- परिजनों, दोस्तों से दूरी, अकेले रहना पसंद।
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