संभवत: सप्ताह के अंत में छुट्टियों से पहले, ज़्यादातर लोग शुक्रवार को राहत की सांस लेते हैं।
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हो सकता है कि आप भी लेते हों, बशर्ते आपके किसी सहकर्मी ने आपका दिन शिकायती और गंदे शब्दों से भरे ईमेल से खराब न किया हो।
हममें से ज़्यादातर लोग परेशान करने वाले ईमेल का जवाब तुरंत देने की कोशिश करते हैं, उसी शैली में। लेकिन ये हमेशा ही ग़लत कदम होता है।
टैलेंट स्मार्ट के प्रेसीडेंट ट्रेविस ब्रैडबेरी द क्यॉर फॉर नास्टी ईमेल
के अपने पोस्ट में ब्रैडबेरी ने लिखा है, "हम सब कटु ईमेल सहते हैं, जो
रहस्यमयी भी होता है, अपमानजनक भी होता है। ऐसे ईमेल में गुस्सा या व्यंग्य
जताया होता है चाहे विस्मयाबोधक चिन्ह या फिर सारे कैपिटल अक्षरों का
इस्तेमाल न किया गया हो।"
हममें से ज्यादातर लोग इसकी प्रतिक्रिया
में क्या करते हैं? ब्रैडबेरी बताते हैं, "किसी को ईमेल के जरिए नीचा
दिखाना लालच इसलिए होता है क्योंकि ये आसान है। लेकिन ऐसा नहीं करना
चाहिए।"
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ब्रैडबेरी कुटता भरे ईमेल का सामना करने के लिए और भावनओं पर नियंत्रण रखने के लिए रणनीति बताते हैं।
परेशान करने वाले ईमेल से खराब दिन की शुरुआत होती है। लेकिन उससे निपटा कैसे जाए? लिंक्डइन के विचारकों ने इस बारे में चार तरीके बताए हैं।
1. लिंकन का अदभुत तरीका
अब्राहम लिंकन को करियर के शुरुआती दौर में एक खराब आदत थी। राजनीतिक विरोधियों को लिखे खतूत में वो हास्य और व्यंग्य करते हुए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते थे। ऐसे एक खत के बाद उनके एक विरोधी ने उन्हें ड्यूएल की चुनौती दी।
अमरीका में उस समय ख़ासे प्रचलित ड्यूएल में - तय समय पर विरोधी आमने-सामने खड़े होते और फिर अपनी पिस्तौल निकाल कर गोली चलाते थे, जो पहले चलाता और सफल रहता, वो बच जाता था और दूसरा व्यक्ति मारा जाता था।
लिंकन को एक सीख मिली थी- शब्दों का असर सामने वाले पर किस तरह से होता है, इसकी पूरी थाह भेजने वाले को कभी नहीं होती।
जब उनका निधन हुआ तो उनके पास से अपने विरोधियों और सहकर्मियों के नाम लिखे ढेरों खत मिले जो अपमानजनक शब्दावली से भरे पड़े थे। लेकिन लिंकन ने उन खतों को कभी उन लोगों तक नहीं भेजा। वे अपना गुस्सा कागज पर उतारते थे और उसके बाद पत्र अपने ड्राअर में रख लेते थे। अगले दिन उसी शख्स को कहीं ज्यादा संयम और संतुलित भाषा वाला खत लिखते थे।
ब्रैडबेरी बताते हैं, "अपना गुस्सा कीबर्ड पर निकलें। पत्र ड्राफ्ट कर लें और जब शांत हों तो उसे फिर पढ़ें।"
ब्रैडबेरी के मुताबिक तब आप जरूरी संपादन करने की स्थिति में होती है। ये भी संभव है कि आप अपने संदेश को फिर से लिखेंगे।
2. स्थिति का रखें ध्यान
ये भी याद रखें कि ऑनलाइन लोग भी लोग ही होते हैं। ब्रैडबेरी बताते हैं कि अनजाने में कंप्यूटर मॉनिटर के सामने बैठकर जीवित इंसान को याद रखना मुश्किल होता है।
वे चेताते हैं, "राइडर यूनिवर्सिटी के मनोचिकित्सक जॉन सूलर ने पाया था कि जिन्हें ऑनलाइन संवाद की आदत पड़ जाती है वो इस एहसास से दूर हो जाते हैं कि दूसरी ओर भी जीता जागता इंसान ही है। ऑन लाइन संवाद की प्रक्रिया में रियल टाइम फीडबैक यानी जीते जागते इंसान के हावभाव नहीं दिखते, इसलिए हम लोगों को ऑनलाइन ठेस पहुंचाने को लेकर ज़्यादा चिंतित नहीं होते हैं।"
ब्रैडबेरी के मुताबिक ऐसे संवाद भेजने से पूर्व कल्पना करनी चाहिए की क्या इससे स्थिति बिगड़ेगी।
ब्रैडबेरी कहते हैं, "क्या आपके पिछले मेल का गलत अर्थ निकाला गया? क्या आज उस व्यक्ति का दिन खराब रहा होगा? क्या उसपर काफी ज़्यादा दबाव होगा? अगर सामने वाला गलत भी है तो आप कंप्यूटर के मॉनिटर की दूसरी तरफ देखिए कि क्या आप मौजूदा स्थिति को और बिगाड़ना चाहेंगे?"
ये जीवन की प्रकृति में है- चीजें होती हैं जो हमारी सोच को प्रभावित करती हैं, हर चीज़ को प्रभावित करती हैं।
अगर दुख निजी हो तो दफ़्तर में एक ख़राब दिन बिताना काफी मुश्किल होता है। वे कहते हैं, "काम कई दुखों को कम करता है, लेकिन ये इलाज तो नहीं है।"
हाउ सक्सेसफुल पीपल डील विद बैड डेज़ नामक पोस्ट में उन्होंने लिखा, "खराब खबरें बोर्ड मीटिंग पूरा होने तक का इंतज़ार नहीं करतीं। अगर आप घर से काम कर रहे हों या फिर दफ्तर में, आप सीईओ हों या इंटर्न। आप काम के बारे में बुरा सोच सकते हैं। कई बार आपको ये थोड़ा परेशान कर सकता है और कई बार बीमार कर सकता है।"
ऐसे में कामयाब लोग दफ्तर में खराब दिन आने पर कैसे निपटते हैं। हाफ़ने कई रणनीतियां बताई हैं, उनमें से कुछ हैं-
"अपनी दिनचर्या कायम रखें। अगर आप कामयाब हैं तो निश्चित तौर पर अच्छी आदतों के साथ रहने वाले अनुशासित शख्स होंगे। इनमें से ज्यादातर आदतों को कायम रखें।"
हाफ़के मुताबिक, "हम खराब चीजों को होने से रोक नहीं सकते हैं। लेकिन हम अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित कर सकते हैं।"
4. छोटे-छोटे लक्ष्य, आगे बढ़ते चलें "आगे बढ़ते चलें। हम सब मुश्किल समय और खराब दिन का सामना करते हैं। क्या हुआ है, उस पर ये निर्भर करता है कि आपकी पीड़ा कब तक रहेगी। कुछ पलों तक या फिर कई महीनों तक। कुछ तो जीवन भर प्रभावित रहते हैं।"
हाफ़ आगे बताते हैं, "हमें छोटे लक्ष्य बनाने चाहिए, प्रत्येक सप्ताह उन लक्ष्यों तक पहुंचना चाहिए ताकि आगे बढ़ते रहें। जो हुआ, उसका सम्मान करें और जो आपके पास है उसकी प्रशंसा।"