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खुद के 'फेसबुक स्टेट्स' ने ही बना दिया उसे मानसिक रोगी!

Tue, 16 Apr 2013 12:57 PM IST
प्रियंका पांडेय पाडलीकर
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इंटरनेट के जिस प्लेटफॉर्म पर हर कोई अपनी सोच बेझिझक 'पोस्ट' करता है, वहीं एक सामाजिक मुद्दे पर अपनी राय देने वाली वह लड़की अपना पक्ष रखते-रखते खुद ही मानसिक समस्या का शिकार हो गई।
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जी हां, यह मामला है दिल्ली की रहने वाली सीमा (बदला हुआ नाम) का, जिन्होंने कुछ महीने पहले गैंग रेप जैसे सामाजिक मुद्दे पर अपना नजरिया 'फेसबुक' पर 'अपडेट' किया और इसपर तरह-तरह के 'कमेंट' और 'मैसेज' का सिलसिला व्यक्तिगत होता गया।

हावी होता गया भय
सीमा के दिलो-दिमाग पर इस अपडेट और इससे जुड़ी प्रतिक्रियाओं का गहरा असर पड़ा। कुछ समय तक तो वह दिन-रात फेसबुक अपनी इस अपडेट पर होने वाली प्रतिक्रियाओं का जवाब-तलब करती और फिर रह-रहकर अपडेट चेक करती रहती।
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बात सिर्फ यहीं नहीं रुकी, सीमा को हर समय ऐसा लगने लगा कि कोई उसे नहीं समझता है और वह बिल्कुल अकेली है। वह कहीं बाहर भी जाती तो उसे हर समय यह भय सताता कि कहीं कोई उसका पीछा कर रहा है या वह कहीं भी सुरक्षित नहीं है।

वर्चुअल दुनिया का असर
उम्र के उस पड़ाव पर युवा पीढ़ी अपनी सोच को जाहिर करने का सबसे आसान और प्रभावी तरीका सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स मानती है। यह पीढ़ी जिन बातों को अपने परिवार या खुद से जुड़ें लोगों से कहने में घबराती है, उसे बेझिझक होकर फेसबुक जैसे बहुतेरे प्लैटफॉर्म पर रख देती है।

कई बार उसपर इस वर्चुअल दुनिया का प्रभाव इतना अधिक होने लगता है कि वह असल जिंदगी में अवसाद, असुरक्षा जैसी कई मानसिक समस्याओं से पीड़ित हो जाती है।

मनोचिकित्सक डॉ. गौरव गुप्ता के पास यह मामला तब पहुंचा जब सीमा गहरे अवसाद में थी और खुद को हर जगह असुरक्षित महसूस कर रही थी। उन्होंने बताया, 'सोशल नेवर्किंग वेबसाइट्स में युवा पीढ़ी अब इस कदर घुल-मिल गई है कि की बार वह इनपर होने वाली गतिविधियों को महज विचार न समझकर असल जिंदगी का हिस्सा मान लेती है जो आगे चलकर मानसिक रोग में भी तब्दील हो सकता है।'

निशाने पर हैं युवा
डॉ. गुप्ता का मानना है कि चूंकि सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स पर सबसे अधिक समय युवा पीढ़ी ही बिताती है और इस उम्र में वह इस पर होने वाली गतिविधियों से प्रभावित भी तेजी से होती है। ऐसे में सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स पर बहुत अधिक सक्रिय रहना, उन्हें वास्तविकता से बहुत दूर कर सकता है, जिसका परिणाम उन्हें मानसिक समस्याओं के रूप में चुकाना पड़ सकता है।

अपनी सीमा खुद तय करें
आमतौर पर ऐसे मामलों में मनोचिकित्सकों की पहली सलाह यही होती है कि कम से कम कुछ समय के लिए सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट से दूरी बरती जाए और धीरे-धीरे इसके इस्तेमाल का समय निर्धारित करें।

डॉ. गुप्ता के अनुसार, ऐसी समस्याओं में हम दवाओं और काउंसिलिंग के साथ-साथ परिवार की भूमिका पर जोर देते हैं। व्यक्ति नेटवर्किंग वेबसाइट पर कम समय तभी बिताएगा जब वह अपने समय का उपयोग परिवार व दोस्तों के साथ बातचीत में बिताएगा।
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सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स आपके लिए लत न बने इसके लिए इन आसान उपायों पर अमल करें।
- इंटरनेट पर सर्फिंग के लिए समय तय करें।
- जिन लोगों को आप नहीं जानते उनसे दोस्ती करने से बचें।
- सामाजिक गतिविधियों में अधिक भाग लें।
- परिवार के साथ समय बिताएं।
- अभिभावक अपने बच्चों को इन्हें लेकर शिक्षित करें, प्रोत्साहित करें और नियंत्रित भी करें।
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