अलगाववादी मसर्रत आलम की रिहाई को लेकर दिल्ली में भले ही हाय तौबा मची हो, लेकिन घाटी में अंदर खाने उसे सैयद अली शाह गिलानी की जगह हुर्रियत कांफ्रेंस और अलगाववादियों का नेता प्रोजेक्ट करने की तैयारी चल रही है।
पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार लंबे समय से बीमार चल रहे गिलानी की जगह किसी कट्टर पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी को काबिज होने देने के पक्ष में नहीं है।
गिलानी की संपत्तियों वाली मिली ट्रस्ट के ताकतवर ट्रस्टी मोहम्मद अशरफ सहराई को गिलानी का मजबूत उत्तराधिकारी माना जा रहा है, लेकिन उनके पाकिस्तानी समर्थक होने की वजह से सरकारी तंत्र आशंकित है।
बीमारी के चलते कम हुई गिलानी की सक्रियता
वहीं, मसर्रत को पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी नहीं माना जाता। खुफिया एजेंसी के उच्चपदस्थ सूत्रों के मुताबिक मसर्रत आलम इस लिहाज से सरकार के लिए सुरक्षित दांव साबित हो सकता है।
2008 में अमरनाथ जमीन विवाद और 2010 की पत्थरबाजी की घटनाओं में सुरक्षा एजेंसियों की नजर में आए मसर्रत ने रिहाई से पहले कई जरूरी भरोसा दिलाया है। घाटी के नौजवानों में मसर्रत की गहरी पैठ है।
सूत्रों के मुताबिक उधर भारत की कूटनीति के चलते पाकिस्तान घाटी में चल रही सुगबुगाहट पर सक्रियता दिखाने से बच रहा है। पाक के इस रुख से अलग-थलग पड़ रहे हुर्रियत का उग्र गुट नाराज है।
मर्सरत मामले पर केन्द्र और राज्य सरकार में डील
माना जा रहा है कि इसीलिए उसने 23 दिसंबर को होने वाले ‘पाकिस्तान डे’के घाटी में बहिष्कार करने की धमकी दी है। हुर्रियत का यह कदम पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को असहज कर सकता है।
सूत्रों के मुताबिक यही वजह है कि दो दिन पहले दिल्ली में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने गिलानी से मुलाकात कर उन्हें मनाने की कोशिश की थी। सूत्रों ने बताया कि पीडीपी और खुफिया एजेंसियों की इस योजना पर केंद्र की सहमति है।
आपसी तालमेल के तहत केंद्र सरकार विरोधी रुख अपनाए रहेगी, लेकिन जमीन पर इस योजना में दखल नहीं दिया जाएगा। सूत्रों ने बताया कि बुधवार को जम्मू-कश्मीर सरकार की कैबिनेट की बैठक में नाराज दिख रही भाजपा ने मसर्रत का कोई मामला नहीं उठाया।