दादरी कांड जैसी घटनाओं का वैचारिक विरोध अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी तक पहुंच गया है। ऐसी घटनाओं से आहत होकर प्रसिद्ध कथाकार काशीनाथ सिंह ने भी शुक्रवार की शाम केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में साहित्य अकादमी पुरस्कार धनराशि सहित लौटाने की घोषणा कर दी।
‘रेहन पर रग्घू’ उपन्यास के लिए उन्हें वर्ष 2011 में यह पुरस्कार मिला था। हालांकि उन्होंने सम्मान लौटाने की तिथि और समय की जानकारी नहीं दी, लेकिन कहा कि जल्द ही वे इसकी प्रक्रिया शुरू कर देंगे। इसके तहत उन्हें एक लाख रुपये, स्मृति चिह्न और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया था।
शाम करीब पांच बजे ब्रिज इन्क्लेव स्थित अपने आवास पर उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि सांप्रदायिक और फासीवादी शक्तियां तीन दशक से भारतीय समाज और लोकतंत्र को नियंत्रण में लेकर उसे अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं के अनुरूप गढ़ने की कोशिश कर रही हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि ऐसी ताकतों ने केंद्रीय सत्ता में आने के बाद पिछले एक वर्ष में अपने एजेंडे को लागू करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। इससे समाज और राजनीति की लोकतांत्रिकता, धर्मनिरपेक्षता दोनों गहरे संकट में है।
अपमानजनक बयानों पर भी जताई नाराजगी
साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस करने की घोषणा के बाद कथाकार ने कहा कि देश में सरकारी सम्मानों और पदवियों की वापसी इसी दुख और क्रोध की एक अभिव्यक्ति के रूप में देखी जानी चाहिए। तर्कवादियों, बुद्धिवादियों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही हिंसा और उनकी हत्याएं चिंता का विषय बन गई हैं। भारतीय समाज की इन परिस्थितियों से समाजोन्मुख और जनपक्षधर लेखक दुखी और क्षुब्ध हैं।
उन्होंने कहा कि साहित्य अकादमी एक स्वायत्त संस्था है। उसकी संरचना में एक सीमित लोकतंत्र अंतरनिहित है। परंतु, यह सीमित लोकतांत्रिकता भी खतरे में है। साहित्य अकादमी को खुलकर भारतीय लोकतंत्र के संवैधानिक मूल्यों और लेखकों की स्वतंत्रता का पक्ष लेना चाहिए। यदि इसमें कोई कमी रही है और लेखकों ने विरोध स्वरूप अपने सम्मान लौटाए हैं तो अकादमी को इसे समझना होगा।
भारतीय भाषाओं के लेखकों के सम्मान लौटाने पर अनेक केंद्रीय मंत्रियों और सत्ताधारी दल के बड़े नेताओं के गैर जिम्मेदाराना और अपमानजनक बयानों पर भी उन्होंने नाराजगी जताई। कहा कि ऐसे अपमानजनक बयानों से हम क्षुब्ध हैं और उनकी भर्त्सना करते हैं।
काशीनाथ सिंह की चर्चित कृतियां
काशी का अस्सी, अपना मोर्चा, सदी का सबसे बड़ा आदमी, घर का जोगी जोगड़ा, रेहन पर रग्घू।
क्या बोले दिग्गज साहित्यकार
'मैं किसी को सम्मान वापस करने के लिए प्रेरित नहीं करूंगा। रही बात प्रो. नामवर सिंह की लेखकों से की गई उस अपील का जिसमें उन्होंने साहित्य अकादमी सम्मान वापस न करने की बात कही है, तो उस पर मैं इतना ही कहूंगा कि हम दोनों घर में भाई हैं लेकिन साहित्य में नहीं। मेरे ख्याल भैया से अलग हो सकते हैं। इस दौर में उनके विचारों से मैं सहमत नहीं हूं। हाल की घटनाओं को लेकर मैं अपने आप को नहीं रोक पाया और सम्मान वापस करने का निर्णय ले लिया।'
- प्रो. काशीनाथ सिंह, कथाकार
'सुधीर कुलकर्णी भाजपा से जुड़े रहे हैं लेकिन उनके भी चेहरे पर कालिख पोती गई। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है। देश में बन रहे असहिष्णुता और भय के वातावरण से मैं भी क्षुब्ध हूं। जिन लेखकों ने अभी तक साहित्य अकादमी सम्मान लौटाए हैं उनके प्रति मेरे मन में बहुत आदर है लेकिन मेरी राय है कि साहित्य अकादमी को इस दौर में कमजोर करना अच्छी रणनीति नहीं है। इसीलिए सम्मान वापसी का फैसला मैं नहीं ले रहा हूं।'
- ज्ञानेंद्रपति, साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त वरिष्ठ कवि
'यह युगांतरकारी पहल है। मुझ समेत मनुष्यता के पक्ष में खड़े सारे रचनाकार काशीनाथ जी के साथ हैं। लेखकों ने देश और समाज के हालात देख अपने जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि का त्याग किया है। ये बड़ी बात है। कम से कम अब तो सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को लेखकों के मत का आदर करना चाहिए। सम्मान लौटाने के पीछे रचनाकारों का मकसद पूरी सहिष्णुता से समझना होगा। हम आगे के संघर्षों के लिए तैयार हैं।'
- व्योमेश शुक्ल, युवा कवि एवं रंगकर्मी