तमाम राजनीतिक गहमागहमी और घमासान के बीच राजनाथ सिंह को निर्विरोध रूप से बीजेपी का नया अध्यक्ष चुन लिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दूसरी पसंद रहे राजनाथ सिंह के समक्ष इस समय सबसे बड़ी चुनौती बिखराव की ओर बढ़ रही भारतीय जनता पार्टी को एकजुट रखने की है क्योंकि कई राज्यों में विधानसभा चुनाव के साथ-साथ सामने 2014 का लोकसभा चुनाव भी है।
सबसे पहले देश के सबसे बड़े राज्य यूपी की बात करते हैं। 2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा सिमट कर 51 सीटों तक ही रह गई और 2009 के आम चुनाव में तो भाजपा को जिस सफलता की उम्मीद थी वह उससे काफी दूर ही रही। अभी पिछली 21 जनवरी को पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भाजपा में दोबारा शामिल हुए हैं।
बताते है कि राजनाथ सिंह कल्याण सिंह को पसंद ही नहीं करते। वहीं पार्टी उपाध्यक्ष कलराज मिश्रा से भी कल्याण सिंह की नहीं बनती है। ऐसी स्थिति में राजनाथ सिंह के गृह प्रदेश में ही भाजपा की राजनीतिक ताकत कैसे बढ़ेगी?
राजनाथ सिंह की सबसे बड़ी चुनौती नरेंद्र मोदी है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक राजनाथ और मोदी के बीच वर्चस्व की लड़ाई देखने को मिल सकती है। 2006 में पहली बार अध्यक्ष बनते ही राजनाथ ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पार्टी की केंद्रीय संसदीय बोर्ड से हटा दिया था।
नरेंद्र मोदी से रिश्ते को दुरुस्त रखना उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि 2014 के आम चुनावों में मोदी प्रधानमंत्री पद के लिए प्रबल दावेदार हैं। कांग्रेस जहां 2014 चुनाव के लिए राहुल गांधी को बड़ी जिम्मेदारी दे चुकी है तो वहीं बीजेपी को उनके मुकाबले के लिए मोदी की जरूरत होगी। मोदी भी इस मौके को छोड़ना नहीं चाहते।
हालांकि पीएम पद की उम्मीदवारी के सवाल पर पार्टी में घमासान खत्म होना इतना आसान नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण राजनाथ का भी एक मजबूत नेता होना हैं जिससे उनकी उम्मीदवारी को भी नकारा नहीं जा सकता। सबसे बड़ी बात ये है कि राजनाथ सिंह की उम्मीदवारी पर जेडीयू जैसी पार्टियां समर्थन भी कर सकती है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि मोदी को राजनाथ का साथ मिलता है या नहीं।
कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा के पार्टी छोड़ने के बाद पार्टी की जबरदस्त किरकिरी हुई है। दिल्ली में एक तरफ जहां राजनाथ सिंह की ताजपोशी हो रही थी वहीं राज्य की भाजपा सरकार के दो मंत्रियों सीएम उदासी और शोभा करंदलाजे ने अपने पदों से इस्तीफा देकर येदियुरप्पा का दामन पकड़ लिया। कर्नाटक की राजनीति में बीजेपी की साख बचाने में राजनाथ सिंह को नाको चने चबाने पड़ सकते हैं।
जहां तक कांग्रेस और यूपीए से लड़ने का सवाल है तो नितिन गडकरी जब तक पार्टी के अध्यक्ष रहे उस दौरान पार्टी के सामने ऐसे कई मौके आए जिसका फायदा उठाकर वह जनता के सामने वह अपनी इमेज बना सकती थी, उन्हें अपने पक्ष में करके उसका राजनीतिक लाभ ले सकती थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पार्टी के नेता और प्रवक्ता सत्ता पार्टी पर हमला करने की बजाय अपने अध्यक्ष को ही बचाने में अपनी सारी उर्जा लगाते रहे।
भाजपा के लिए अच्छी बात ये है कि राजनाथ सिंह अभी तक किसी भी तरह के विवाद से दूर रहे हैं तो इससे उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले चुनाव को देखते हुए पार्टी के नेता और कार्यकर्ता आक्रमक दिखेंगे। यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि 2009 का लोकसभा चुनाव राजनाथ सिंह की ही अध्यक्षता में भाजपा ने लड़ा था जिसमें पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा था।
अब देखना ये है कि 2014 के चुनाव में भाजपा की नैया कितना पार लगा सकते हैं नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह।