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उद्धव ठाकरे को घुटनों के बल बैठकर क्यों मांगने पड़े वोट, 10 कारण

Wed, 15 Oct 2014 01:51 PM IST
वेद विलास उनियाल/अमर उजाला, दिल्ली
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उद्धव ठाकरे बेशक शिवसेना के नेता हों, लेकिन वह बाल ठाकरे जैसा करिश्माई नेता नहीं हैं। वे पूरी तरह शिवसेना को अपने प्रभाव में नहीं रख पाए हैं। यही कारण है कि उद्धव को घुटनों के बल बैठकर वोट मांगने पड़े। इसके अलावा भी और कई कारण हैं।
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1- मराठी वोटों का विभाजन शिवसेना के लिए सबसे बड़ी दिक्कत है। मराठी वोट कई खांचों में बंट रहा है। भाजपा के अलग होने पर हिंदुत्व धारणा पर वोट देने वालों के लिए प्राथमिकता भाजपा ही होगी। जो गुजराती और गैर मराठा, खासकर दलित वोट शिवसेना से लोकसभा में साथ था, इस बार खिसकर जाएगा।

2- शिवसेना का प्रभाव पूरे राज्य में नहीं है। विदर्भ उत्तर महाराष्ट्र में उसकी जो पकड़ है, वह भाजपा के साथ रहने पर थी। अब वह मुंबई कोंकण रत्नागिरी के सीमित क्षेत्र में हैं। इतने से उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री नहीं बनते।
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3- उद्धव ठाकरे बेशक शिवसेना के नेता हों, लेकिन वह बाल ठाकरे जैसा करिश्माई नेता नहीं है। वे पूरी तरह शिवसेना को अपने प्रभाव में नहीं रख पाए हैं। हालांकि शिवसेना का विघटन उसी दिन से शुरू हो गया था जब मनोहर जोशी के मुख्यमंत्री बनाए जाने पर नाराज छगन भुजबल ने शिवसेना को छोड़ा था। इसके बाद शिवसेना के कई प्रभावी नेताओं का दल को छोड़ना शुरू हो गया। यह सिलसिला चलता रहा। उद्धव ठाकरे राज्य में शिवसेना के विस्तार के लिए कुछ खास नहीं कर पाए। उसे नई मुहीम नहीं दे पाए।

4- शिवसेना भले ही राज्य में बड़ी पार्टी कहलाती हो, लेकिन चुनाव का रिकार्ड में भाजपा हमेशा बेहतर रही। भाजपा के पुराने नेताओं ने इसके बावजूद शिवसेना को ही बड़े भाई का दर्जा दिया। बाल ठाकरे के प्रभाव में भाजपा ने कभी बड़ी पार्टी का हक नहीं जमाया। लेकिन अब शिवसेना इस बात पर चिंतित है कि भाजपा का विस्तार उसके प्रभाव को कम न कर दे। चुनाव में भी इसका असर दिख सकता है।

5- महाराष्ट्र में आम व्यक्ति यही कहता है कि शिवसेना के लिए आदर्श स्थिति यही होती कि बाल ठाकरे राज ठाकरे को कमान सौंपते और पार्टी में उद्धव ठाकरे का सम्मान रहता। लेकिन पुत्र मोह के चलते उन्होंने उद्धव ठाकरे को आगे किया। पार्टी के लिए राज ठाकरे जो कर सकते थे, उद्धव ठाकरे उसमें कहीं पीछे रह गए। समस्या यही है कि राज जुड़ना चाहते हैं लेकिन उद्धव और उनके बेटे आदित्य को कई आशंकाएं हैं। आदित्य को भविष्य की सल्तनत दिखती है और राज ठाकरे को वे अपने मार्ग की बाधा समझ रहे हैं।

6- भाजपा के पास राज्य में कोई फेस फिलहाल नहीं है। लेकिन नरेंद्र मोदी ने ताबड़तोड़ सभाएं करके शिवसेना की दिक्कतें बढ़ा दी हैं। भाजपा वोट भी मोदी के नाम पर मांग रही है। ऐसे में शिवसेना अपने को दिक्कत में पा रही है।

7- भाजपा बहुत सुनियोजित ढंग से प्रचार कर रही है। शिवसेना का विरोध नहीं कर रही है। उसने सीधे सीधे कांग्रेस राकांपा के पिछले दस वर्षों के शासन की कमजोरियों को निशाना बनाया है। जबकि शिवसेना को भाजपा का भी विरोध करना पड़ रहा है। इससे वह सत्ता के खिलाफ खड़ी पार्टी नहीं लग रही है। इससे सत्ता पक्ष के खिलाफ भाजपा ने ही माहौल बनाया है, वही ऐसे वोट पर ज्यादा आस करने की स्थिति में होगी।

8- राकांपा नेता शरद पवार उद्धव ठाकरे की प्रशंसा कर रहे हैं। लेकिन राकांपा ही शिवसेना के वोट का असली विभाजन कर रही है। राकांपा को पाला बदलते भी देर नहीं लगेगी।

9- राज ठाकरे ने भी शिवसेना की कमी निकालने और समय समय पर उसे लांछित करने में कोई कमी नहीं रखी। राज ठाकरे ने अच्छी तरह प्रचारित करवा दिया कि वह उद्धव से समझौता करना चाहते थे, लेकिन उद्धव की महत्वाकांक्षा आड़े आई। इससे उद्धव की सत्ता के प्रति चाहत साफ झलकी। उन्हें जोर देकर बताना पड़ रहा है कि वह सत्ता के लिए नहीं शिवसेना को बचाने के लिए आगे आए हैं।

10- शिवसेना को डर है कि अगर परिणाम ठीक नहीं रहे तो फिर शिवसेना का अस्तित्व सिमट जाएगा, यह बड़ी चुनौती है। इसलिए एक समय गरजने बरसने पर विश्वास करने वाली शिवसेना के नेता उद्धव अपने बेटे को लेकर मंच पर मतदाताओं के सामने साष्टांग प्रणाम करते हुए नजर आते हैं। वक्त क्या न करा दे, वक्त कब करा दे।
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