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नटवर सिंह से नाराज क्यों थीं सोनिया?

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अपने खिलाफ विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर पार्टी तोडऩे वाले शरद पवार और कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लडऩे वाले जितेंद्र प्रसाद के साथ फिर अपने रिश्ते सामान्य कर लेने वाली सोनिया गांधी ने नटवर को कांग्रेस से क्यों बेदखल किए रखा, यह सवाल सियासी गलियारों में आम है।
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जबकि दस जनपथ के वफादारों में उनकी गिनती पहले नंबर पर होती थी। सोनिया गांधी को उनके पहले नाम से बुलाने का विशेषाधिकार भी उन्हें प्राप्त था। दस जनपथ के करीबी लोगों की मानें तो सोनिया के प्रधानमंत्री न बनने की स्थिति में नटवर सिंह खुद को उस पद के स्वाभाविक दावेदार के रूप में देखते थे।

सोनिया गांधी को लेकर क्या चल रही थी बात?

दस जनपथ के एक करीबी कांग्रेसी नेता के मुताबिक इसका इशारा उन्होंने नेहरू गांधी परिवार के एक अन्य करीबी माखनलाल फोतेदार के सामने पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से यह कहते हुए किया था कि मुमकिन है कि सुरक्षा की शंकाओं से ग्रस्त पारिवारिक दबाव की वजह से शायद सोनिया गांधी प्रधानमंत्री न बनकर अपने किसी भरोसेमंद को यह जिम्मेदारी भी दे सकती हैं। इस नेता के मुताबिक तब नटवर का इशारा अपने लिए था।

यह दोनों तब 2004 के लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में धर्मनिरपेक्ष दलों की संभावित सरकार के गठन में विश्वनाथ प्रताप सिंह से मदद मांगने के लिए गए थे। हालाकि तब फोतेदार ने बाहर आकर नटवर से उनके इस कथन के प्रति कड़ा एतराज भी जताया था। बाद में यह बात दोनों ने अपने अपने तरीके से सोनिया को भी बताई थी,जिसे लेकर वह असहज भी हुईं थीं । बाद में इसकी पुष्टि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने एक प्रेस बयान में भी की थी।

सोनिया गांधी को किसने किया नाराज?

यह भी एक बड़ी वजह थी कि नटवर कभी भी प्रधानमंत्री पद के लिए सोनिया की पसंद उन मनमोहन सिंह को जिन्हें नरसिंह राव राजनीति में लाए थे, कभी मन से स्वीकार नहीं कर सके। दोनों केबीच पहली दरार यहीं से पड़ी थी।

बाद में नटवर के धमकी भरे तेवरों ने सोनिया को इस कदर नाराज कर दिया कि पाठक जांच आयोग की रिपोर्ट में बरी होने के बावजूद नटवर सिंह की कांग्रेस और यूपीए सरकार में वापसी नहीं हो सकी।

दस जनपथ के करीबी एक अन्य कांग्रेसी नेता के मुताबिक इराक में तेल कूपनों केजरिए हुए अरबों डॉलर के घोटाले की जांच करने वाली वोल्कर कमेटी की रिपोर्ट में नटवर सिंह का नाम आने के बाद जब विपक्षी दलों ने संसद में जबर्दस्त हंगामा करते हुए कई दिनों तक संसद नहीं चलने दी और सरकार पर नटवर के विदेश मंत्री पद से इस्तीफे का दबाव खासा बढ़ गया। तब सोनिया गांधी ने नटवर को दस जनपथ बुलाकर उनसे इस्तीफा देने को कहा।

कांग्रेस ने बंद किए अपने दरवाजे

नटवर ने परिवार और पार्टी के प्रति अपनी वफादारी का हवाला देते हुए ना नुकुर की। लेकिन सोनिया ने अपना रुख कड़ा रखा तो नटवर मुंह खोलने की बात कहते हुए बिफर गए।

दस जनपथ के इस करीबी नेता के मुताबिक नटवर की यह धमकी सोनिया गांधी को बेहद अखर गई और वहीं से कांग्रेस के दरवाजे उनके लिए बंद हो गए। बताया जाता है कि इसके बाद नटवर को इस्तीफा देना पड़ा।

लेकिन उनकेबगावती तेवरों की वजह से दस जनपथ की नाराजगी बढ़ती गई। कांग्रेस में उनके विरोधी भी सक्रिय हो गए। हालाकि माखनलाल फोतेदार और दस जनपथ के कुछ अन्य भरोसेमंदों ने सुलह सफाई की कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी।
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सोनिया गांधी नहीं हुई तैयार

इधर नटवर की भाजपा नेता यशवंत सिन्हां, समाजवादी पार्टी के तत्कालीन महासचिव अमर सिंह जो उन दिनों कांग्रेस और दस जनपथ के खिलाफ खासे मुखर थे, से नजदीकियां बढऩे लगीं।

नटवर ने मीडिया में बयानबाजी की जिसकी वजह से उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। नटवर ने भाजपा के साथ पींगे बढ़ाई लेकिन 2009 केलोकसभा चुनावों में कांग्रेस की वापसी से वह कमजोर पड़ गए। हालाकि वोल्कर मामले की जांच के लिए गठित पाठक आयोग ने उन्हें बरी कर दिया। तब उन्हें कांग्रेस में लेने की फिर कोशिश हुई, लेकिन सोनिया तैयार नहीं हुईं।

इसके बाद कांग्रेस के तमाम नेताओं ने नटवर से दूरी बढ़ा ली। लेकिन भाजपा नेताओं की उनसे निकटता बढ़ती गई और उनके बेटे जगत सिंह भाजपा में शामिल भी हो गए जो अब राजस्थान में विधायक हैं। नटवर खामोशी से मौके की तलाश में बैठे अपनी आत्मकथा लिखते रहे। लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी हार ने उन्हें यह मौका दे दिया।
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