संगीत प्रेमियों को यह जानकर खुशी होगी कि 26 जनवरी से ऑल इंडिया रेडियो 24 घंटे का एक ऐसा चैनल शुरू करने जा रहा है जो पूरी तरह से संगीत को, विशेषकर शास्त्रीय संगीत को, समर्पित होगा इसका नाम है रागम्।
यह बात उन लोगों को अजीब लग सकती है जो यह मान बैठे हैं कि रेडियो का युग अब समाप्त हो गया है और टेलीविजन का बस समाप्त होने ही वाला है, क्योंकि जब हर चीज इंटरनेट और यूट्यूब पर उपलब्ध है, तो फिर रेडियो या टीवी की तरफ कौन रुख करेगा! लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? आज भी भारत की आबादी के लगभग 40 प्रतिशत के पास ही इंटरनेट की सुविधा है और वह भी हर जगह हर समय काम नहीं करती क्योंकि अनेक गांवों और कस्बों में बिजली ही गायब रहती है। लेकिन बैटरी से चलने वाला ट्रांज़िस्टर रेडियो हर जगह चल सकता है।
इसलिए आकाशवाणी के प्रसारण देश के कुल इलाके के 92 प्रतिशत तक और कुल आबादी के 99.19 प्रतिशत तक पहुंचते हैं। फिर, दूरदर्शन के डीडी भारती चैनल को छोड़कर किसी भी अन्य टीवी चैनल पर संगीत या साहित्य से जुड़ा कोई गंभीर कार्यक्रम प्रसारित नहीं किया जाता। इसलिए संगीतप्रेमियों के लिए आकाशवाणी सुनना अनिवार्य-सा है।
ऑल इंडिया रेडियो बना सहारा
1856 में वाजिद अली शाह की गद्दी छिनी और अगले साल ही मुगल राजवंश की प्रतीकात्मक सत्ता भी खत्म हो गई। नतीजतन तानरस खां जैसे चोटी के गायक को दिल्ली छोड़कर हैदराबाद में शरण लेनी पड़ी। बहुत से संगीतकार कलकत्ता (कोलकाता) और बंबई (मुंबई) में बस गए क्योंकि वहां उन्हें संगीतरसिक सेठों का प्रश्रय मिलने लगा था।
1947 तक आते-आते राजाओं-नवाबों का दौर खत्म हो गया और राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान पैदा हुई सुधारवादी और नैतिकतावादी दृष्टि के कारण संगीतजीवी पुरुष और महिला कलाकारों के प्रति विरोध का भाव भी बढ़ने लगा। संगीतकारों को मिलने वाला पारंपरिक सामंतवादी संरक्षण बंद हो गया और बड़े-बड़े संगीतकारों को रोटियों के लाले पड़ने लगे। ऐसी आपदा में ऑल इंडिया रेडियो ने ही उन्हें सहारा दिया। भारत में रेडियो का युग 1923 में शुरू हो चुका था और 1936 के आते-आते ऑल इंडिया रेडियो की स्थापना हो गई थी।
उसने प्रसिद्ध संगीतकारों को आमंत्रित करके उनके कार्यक्रम प्रसारित करना शुरू किया जिसके कारण उन्हें देश भर में सुना जाने लगा और उन्हें देशव्यापी ख्याति मिलने लगी। रेडियो के आगमन से पहले संगीत की प्रस्तुति एक जगह तक सीमित थी और उसे कुछ श्रोता ही सुन सकते थे। ग्रामोफोन के आने से रिकॉर्ड की हुई प्रस्तुति को किसी भी समय और किसी के भी द्वारा सुनना संभव हुआ लेकिन उस समय तकनीकी सीमाओं के कारण केवल साढ़े तीन या चार मिनट के रिकॉर्ड ही बनते थे और कलाकार को अपनी कला को इसी सीमा में बंधकर पेश करना होता था। लेकिन रेडियो पर आधे घंटे-एक घंटे की प्रस्तुति भी संभव थी।
कई लाइव प्रस्तुतियां हवा हो गईं
दुर्भाग्य से उस समय बहुत कम प्रस्तुतियां रिकॉर्ड की जाती थीं और अधिकांश का प्रसारण लाइव ही होता था। इसलिए अनेक महान गायकों-वादकों की 1930 और 1940 के दशक की प्रस्तुतियां लाइव प्रसारण के साथ ही हवा हो गईं। ऑल इंडिया रेडियो ने बहुत-से अच्छे संगीतकारों को नौकरियां भी दीं जिनके कारण उनकी नियमित आय की व्यवस्था हो गई।
1950 के दशक में बी वी केसकर सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने और दस साल तक वे इस पद पर रहे। एक विद्वान और प्रखर राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ केसकर स्वयं ध्रुपद गायन में प्रशिक्षित थे। उन्होंने प्रति वर्ष आकाशवाणी संगीत सम्मेलन और प्रति सप्ताह संगीत का राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया। इन कार्यक्रमों की इतनी प्रतिष्ठा थी कि बड़े-बड़े संगीतकार इनमें शिरकत करने की आकांक्षा रखते थे क्योंकि इन प्रसारणों को देश भर में न केवल संगीत रसिक बल्कि संगीतकार भी सुनते थे।
एक बार प्रसिद्ध सरोदवादक बुद्धदेव दासगुप्त ने मुझे बताया था कि संगीत के राष्ट्रीय कार्यक्रम में जब पहली बार अली अकबर खां ने अपना वादन प्रस्तुत किया था, उसी के साथ उनकी गणना शीर्षस्थ सरोदवादकों में होने लगी थी। उस समय अली अकबर खां आकाशवाणी के लखनऊ केंद्र में नौकरी करते थे। रविशंकर जैसे चोटी के सितारवादक आकाशवाणी वाद्यवृंद के निदेशक थे। मल्लिकार्जुन मंसूर का आकाशवाणी से इतना लगाव था कि गले के कैंसर के कारण कष्ट झेलते हुए भी मृत्यु से केवल बारह दिन पहले उन्होंने धारवाड़ केंद्र जाकर अपनी अंतिम प्रस्तुति रेकॉर्ड कराई थी। राग था ‘मियां की मल्हार’ और बंदिश थी ‘करीम नाम तेरो’।
जब फेल हो गए नामी कलाकार
जब आकाशवाणी में पहले-पहल ऑडिशन और उसके बाद ग्रेड दिए जाने का चलन शुरू हुआ तो बहुत-से नामी कलाकार फेल हो गए या उन्हें बहुत निचला ग्रेड दिया गया।
बनारस की मशहूर ठुमरी गायिका बड़ी मोती बाई फेल हो गई थीं और सारंगीनवाज शकूर खां को निचला ग्रेड मिला था। कारण यह था कि रागसंगीत को शास्त्रीयता प्रदान करने वाले विष्णु नारायण भातखण्डे के शिष्य श्रीकृष्ण नारायण रातनजनकर परीक्षक थे और वे उस्तादों से सैद्धान्तिक प्रश्न करते थे।
घरानेदार उस्ताद अपने फन में माहिर थे और उसे “करत की विद्या” समझते थे पर उन्हें उसके सैद्धान्तिक पक्ष की जानकारी नहीं थी। उनसे यह उम्मीद करना दुराग्रह ही था, जिसे बाद में बहुत कुछ छोड़ दिया गया। अनेक अमूल्य रिकॉर्डिंग नष्ट हो जाने के बाद भी आकाशवाणी के संग्रहालय में हजारों दुर्लभ रिकॉर्डिंग हैं। उम्मीद है कि उन्हें इस नए चैनल पर सुनवाया जाएगा।