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'जो मर्द बंधन खोल देता था, उसे दुल्हन मिलती थी'

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जल्लीकट्टू पर लगे प्रतिबंध को जारी रखने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से लगता है कि परंपरा पर कानून की जीत हुई है। लेकिन जल्लीकट्टू के दौरान वाकई होता क्या है और सदियों पुराने इस प्रचलन पर रोक लगाने के मायने क्या हैं?
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जल्लीकट्टू का शाब्दिक अर्थ होता है 'सांड को गले लगाना'। 'जल्ली' का मतलब होता है सिक्का और 'कट्टू' का मतलब होता है बांधना। इसकी शुरुआत ईसा-पूर्व काल में हुई थी जब सोने के सिक्कों को सांड के सींग में बांधकर इसे खोला जाता था। इस खेल के दौरान सांड को एक बाड़े में से छोड़ दिया जाता है और नौजवान मर्दों की भीड़ की चिल्लाहट सुनकर सांड दौड़ पड़ते हैं।

तमिल विद्वान और पेरियारवादी थो पारामासिवम कहते हैं, "नौजवान मर्दों के लिए सांड के कूबड़ को पकड़कर सींग में बंधे सोने का सिक्का निकालना एक चुनौती है।" वह कहते हैं, "इसमें किसी प्रकार की कोई हिंसा नहीं होती। 30 गज के अंदर ही इस बंधन को खोलना होता है जो वाकई कुछ सेकेंड का ही काम होता है।"
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जानवरों को प्रताड़ित किए जाने की अफवाहें

गांधीग्राम रूरल यूनिवर्सिटी, मदुरैई में तमिल साहित्य के असिस्टेंट प्रोफेसर सुंदर काली कहते हैं, "कृषि से जुड़े त्योहार को पोंगल कहते हैं। जल्लीकट्टू मट्टा पोंगल के दौरान खेला जाता है।" ज्यादातर तमिलनाडु के दक्षिणी जिलों में जल्लीकट्टू खेला जाता है।

मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज (एमआईडीएस), चेन्नई के एसोसिएट प्रोफेसर सी लक्ष्मणन ने बताया, "कोयंबटूर के पास राज्य के पश्चिमी जिलों में खेती में इस्तेमाल होने वाले जानवरों को नहलाया जाता है, उन्हें रंगीन मालाओं से सजाया जाता है और फिर उसे जल्लीकट्टू के लिए लाया जाता है।"

कहा जाता है कि सांडों को भड़काने के लिए आंखों में मिर्च डालने और शराब पिलाने जैसी तरकीबों का भी इस्तेमाल होता है। मगर सुंदर काली इसे गलत बताते हैं, "जानवरों को प्रताड़ित करने की बातें अफवाह हैं। हो सकता है कुछ लोग शराब पिलाते हों जैसे कुछ एथलीट दौड़ने से पहले शक्तिवर्धक दवा लेते हैं। लेकिन चिंता की बात इनकी नस्लों को पालने की कला को लेकर है।"
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' सांड पालना एक कला है'

जो लोग जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध का विरोध कर रहे है, उन्हें संदेह इस बात को लेकर है कि, "तमिलनाडु सांडों की नस्लों को विकसित करने के मामले में पिछड़ जाएगा। सांड पालना एक कला है और यह प्रतिबंध के साथ लुप्त हो जाएगी।" सवाल यह भी है कि भीड़ में मौजूद किसी औरत का दिल जीतने के लिए जो मर्द बंधन खोलने को लेकर उतावले रहते हैं, उनका क्या होता है?

पारामासिवम बताते हैं, "हां, इसके साथ इज्जत का मसला जुड़ा था। जो मर्द बंधन खोल देता था, उसकी शादी के लिए दुल्हन मिलती थी। लेकिन अब यह प्रचलन में नहीं है।" हालांकि लक्ष्मणन के विचार इससे जुदा हैं। वह कहते हैं, "ये मूल रूप से जातीय गर्व और सिर्फ मर्द की दिलेरी का सार्वजनिक प्रदर्शन है। अगर गोपनीय तरीके से चुनाव करवाएं तो महिलाएं जल्लीकट्टू का विरोध करेंगी।"

"यह सिर्फ जानवरों के अधिकार का मसला नहीं। यह औरत के मानवाधिकार का भी सवाल है। अगर मर्द इस खेल के दौरान घायल होता है या मर जाता है, तो एक औरत को ही झेलना पड़ता है।" फिर जल्लीकट्टू के समर्थन में आखिरकार सारे राजनीतिक दल एकजुट क्यों हैं? लक्ष्मणन कहते हैं, "क्योंकि इस साल चुनाव है और सभी दल जल्लीकट्टू में भाग लेने वाली दबंग जातियों का वोट पाना चाहते हैं।" वह आगे कहते हैं, "हो सकता है यह परंपरा रही हो। तब की बात अलग थी। अब समय बदल चुका है। अब यह तमिल पहचान से जुड़ा हुआ सवाल नहीं है।"
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