टीम इंडिया के सबसे करिश्माई कप्तान और भारत को कई स्वर्णिम सफलता दिलाने वाले महेन्द्र सिंह धोनी का यूं अचानक टेस्ट क्रिकेट से संन्यास का फैसला लोगों के गले नहीं उतर रहा है। वो भी तब जब भारत टीम आस्ट्रेलिया दौरे पर मुश्किलों से जूझ रही है।
विज्ञापन
ऐसे में कप्तान धोनी का सीरीज खत्म होने से पहले ही अचानक कप्तानी के साथ-साथ टेस्ट क्रिकेट छोड़ने का फैसला कई सवाल खड़े कर रहा है। सवाल इसलिए भी हैं कि धोनी ने इस फैसले से पहले किसी को इस बारे में भनक तक नहीं लगने दी। जबकि आमतौर पर बड़े खिलाड़ी संन्यास जैसा महत्वपूर्ण फैसला लेने से पहले इस तरह के संकेत जरूर देते हैं।
ऐसे में फिर क्या वजह रही कि उन्होंने अचानक यूं टेस्ट क्रिकेट छोड़ने का फैसला किया वो भी टीम इंडिया को यूं मुश्किल परिस्थितियों में छोड़कर। जानकारों की मानें तो कैप्टन कूल के इस फैसले के पीछे पांच बड़े कारण माने जा रहे हैं।
विज्ञापन
विदेशों में लगातार हार से उठे सवाल
पिछले कुछ समय से लगातार
भारतीय टीम को विदेशी धरती पर शर्मनाक पराजयों का सामना करना पड़ रहा है।
इसके कारण महेन्द्र सिंह धोनी के नेतृत्व पर भी लगातार उंगली उठ रही हैं।
हालिया आस्ट्रेलिया दौरे में भारतीय टीम शुरूआत दो मैच गंवाने के बाद सीरीज
से पहले ही हाथ धो बैठी है।
जबकि इससे पहले 2011 में भी भारतीय टीम
को 0-4 से पराजय का सामना करना पड़ा था। इसके अलावा गत वर्ष इंग्लैंड और
न्यूजीलैंड में भी भारत को टेस्ट सीरीज में पराजय का सामना करना पड़ा था।
कुल मिलाकर धोनी के नेतृत्व में भारत लगातार छह सीरीज में हार का मुंह देख
चुका है।
भारतीय टीम एक समय टेस्ट में नंबर वन जरूर वन बनी लेकिन
उसमें भी बड़ा योगदान भारतीय और एशियाई पिचों पर जीत का रहा। विदेशी धरती
पर भारतीय टीम हमेशा ही जूझती नजर आई। ऐसे में धौनी लगातार आलोचनाओं के
घेरे में थे, उन्हें कहीं न कहीं अपनी गद्दी गंवाने का डर भी सता रहा होगा।
टेस्ट में कभी नहीं रहा दमदार रिकार्ड
वनडे मैचों में भारत को वर्ल्ड कप सहित कई एतिहासिक विजय दिलाने वाले महेन्द्र सिंह धोनी का रिकार्ड टेस्ट कभी बढ़िया नहीं रहा। न कप्तान के तौर पर न खिलाड़ी के तौर पर। वनडे में जहां उन्होंने कई मैच जिताऊ पारियां खेली वहीं टेस्ट में उनका खाता खाली ही रहा। अपने 90 टेस्ट के कॅरियर में 6 शतक और 33 अर्धशतकों के साथ कुल 4876 रन बनाए।
इसमें उनका एक दोहरा शतक भी शामिल रहा। इस दौरान उनका औसत मात्र 38.09 का रहा, जो पूरी तरह औसत ही माना जाएगा। जबकि वनडे में 53 की औसत के साथ वह दुनिया के अच्छे अच्छे धुरंधरों को पीछे छोड़ते नजर आए।
ऐसे में जब भारतीय टीम लगातार बदलाव के दौर से गुजर रही थी वहां धोनी को टेस्ट में अपनी जगह भी खतरे में नजर आ रही थी। हो सकता था कि उन्हें कभी भी इसके लिए संकेत दिए जा सकते थे। यही कारण है कि धोनी ने उस स्थिति से बचने के लिए खुद ही टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहकर सम्मानजनक रास्ता चुनना बेहतर समझा।
सुप्रीमकोर्ट में श्रीनिवासन विवाद
पिछले कुछ समय से क्रिकेट की सबसे ताकतवर संस्था बीसीसीआई सुप्रीम कोर्ट के रहमोकरम पर टिका हुआ है। आईपीएल विवाद को लेकर बीसीसीआई के बॉस श्रीनिवासन खुद सुप्रीम कोर्ट के निशाने पर हैं। बीसीसीआई पर दोबारा काबिज होने की श्रीनिवासन की हर कोशिश को सुप्रीम कोर्ट लगातार असफल करता आ रहा है ऐसे में बीसीसीआई में श्रीनिवासन के भाग्य पर प्रश्नचिह्न लगा हुआ है।
यह भी साफ है कि एक बार श्रीनिवासन बीसीसीआई से बेदखल हुए तो फिर उनकी टीम चेन्नई सुपरकिंग्स का भी आईपीएल से बाहर होना तय है। क्योंकि हितों के टकराव और चेन्नई सुपरकिंग्स के लिए नियमों में बदलाव के आरोप नए नहीं हैं। इन्हीं नियमों के कारण पूर्व में आईपीएल से दो टीमों को बाहर किया जा चुका है।
ऐसे में श्रीनिवासन की टीम का कप्तान होने के कारण आईपीएल में धौनी के भाग्य भी अधर में है। इसलिए में वह कभी नहीं चाहेंगे की शानदार कॅरियर के बीच उन्हें इन परिस्थितियों से भी जूझना पड़े। वहीं श्रीनिवासन की स्थिति खराब होने के कारण बीसीसीआई में भी धोनी की स्थिति पहले की तरह उतनी मजबूत नहीं रह गई थी।
फिक्सिंग विवाद
दूसरी ओर श्रीनिवासन के साथ ही जुड़े एक और विवाद में धोनी का नाम आ रहा है, वो है फिक्सिंग विवाद। आईपीएल में फिक्सिंग विवाद में कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का नाम भी लगातार उछलता रहा है।
क्योंकि श्रीनिवासन की टीम चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान होने के अलावा वह इंडिया सीमेंट्स में पदाधिकारी भी हैं और इस टीम के मैनेजर गुरुनाथ मयप्पन का नाम मैच फिक्सिंग के मुख्य सूत्रधार के रूप में सामने आ चुका है।
ऐसे में टीम से जुड़े होने के कारण हितों के टकराव और मैच फिक्सिंग की जानकारी होने के बावजूद भी चुप रहने को लेकर धोनी पर उंगली उठती रही हैं। एक प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट भी उनका जिक्र कर चुका है। मामले में अभी सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आना बाकी है।
इस बात की भी आशंका जताई जा रही थी कि कहीं इसमें धोनी की भूमिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट कोई टिप्पणी न कर दे, ऐसे में महेन्द्र सिंह धोनी को कप्तान रहते असहज स्थितियों का सामना करना पड़ सकता था।
टेस्ट मैचों में लगातार हार के कारण धोनी की कप्तानी पर भी संकट के बादल मंडरा रहे थे। वहीं आस्ट्रेलिया में पहले ही टेस्ट में विराट कोहली जीत और जूझने का शानदार जज्बा दिखा चुके हैं, जहां भारतीय टीम उनकी कप्तानी पारी के दम पर एक समय जीत के बहुत करीब पहुंच गई थी।
पहले ही मैच में कोहली ने भविष्य के कप्तान की झलक भी दिखा दी थी। उन्होंने उन आशंकाओं को भी दरकिनार कर दिया था जिनमें कप्तानी के दबाव में उनकी बल्लेबाजी प्रभावित होने की बात कही जा रही थी। ऐसे में धोनी को कप्तानी से हटाकर विराट कोहली को कप्तान बनाने की चर्चाओं ने भी जोर पकड़ लिया था।
माना जा रहा था कि लगातार कड़े फैसले ले रहा बीसीसीआई इस संबंध में भी जल्द फैसला कर सकता है। ऐसे में लगातार सात साल कप्तान रहने के बाद धोनी के लिए अपने जूनियर के निर्देशन में खेलना थोड़ा मुश्किल भरा हो सकता था। माना जा रहा है इसी स्थिति से बचने के लिए भी उन्होंने अचानक इतना बड़ा कदम उठाया।