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मोदी के खिलाफ कांग्रेस से लड़ना चाहता था कोई और

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नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर उनकी तारीफ करने वाले और मोदी, भाजपा और संघ परिवार के धुर विरोधी माने जाने वाले स्वामी अग्निवेश कुछ दिन पहले तक वाराणसी से मोदी के खिलाफ कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लडऩा चाहते थे।
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बनारस से चुनाव लड़कर स्वामी अग्निवेश मोदी के साथ साथ अरविंद केजरीवाल से भी अपना पुराना हिसाब चुकाना चाहते थे। लेकिन कांग्रेस ने उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी। मोदी को लिखे अपने पत्र पर स्वामी अग्निवेश का कहना है कि उन्हें लगता है कि मोदी अब हिंदुत्ववादी ताकतों से अपनी दूरी बना रहे और समावेशी विकास की तरफ बढ़ रहे हैं, इसलिए उन्होंने अपनी स्वतंत्र राय व्यक्त की है।

अमर उजाला केपास यह पुख्ता जानकारी है कि अप्रैल के पहले सप्ताह में स्वामी अग्निवेश ने अपने एक पूर्व सहयोगी और एक पत्रकार मित्र से इस पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस वाराणसी से नरेंद्र मोदी के खिलाफ उन्हें चुनाव लड़ा दे तो मुकाबला बेहद कांटे का और दिलचस्प हो जाएगा।
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कर चुके हैं अटल बिहारी वाजपेयी की तारीफ

अग्निवेश की मंशा खुद को केजरीवाल के मुकाबले मोदी विरोध का बड़ा प्रतीक साबित करने की थी। अग्निवेश ने कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं से संपर्क साधने की खासी कोशिश की। उन्होंने सोनिया गांधी केराजनीतिक सचिव अहमद पटेल, वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा, महासचिव जनार्दन द्विवेदी तक को संदेश भेजे।

अन्य संपर्को के जरिए भी अपनी बात सोनिया गांधी और राहुल गांधी तक पहुंचाने की कोशिश की। लेकिन कांग्रेस ने स्थानीय उम्मीदवार उतारने का फैसला कर लिया था। गैर कांग्रेसवाद से अपनी राजनीति शुरु करने वाले स्वामी अग्निवेश खुद को तीसरे मोर्चे के ज्यादा करीब पाते रहे हैं।

नवंबर 1984 के सिख विरोधी दंगों के बाद वह कांग्रेस के विरोध में सड़कों पर उतरे और संघ परिवार के केराम मंदिर आंदोलन को लेकर वह भाजपा के खिलाफ भी मोर्चा लगाते रहे। लेकिन उन्होंने 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार द्वारा किए गए परमाणु परीक्षण के बाद वाजपेयी की तारीफ की थी।
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मोदी के विरोधी

2002 में गुजरात दंगों के बाद मोदी सरकार, विहिप और संघ परिवार के खिलाफ अग्निवेश ने गुजरात में यात्रा भी निकाली। बाद में स्वामी अग्निवेश की निकटता कांग्रेस से बढ़ी। वह दस जनपथ के बेहद करीब पहुंच गए।

2004 के चुनाव में उन्होंने कांग्रेस का समर्थन भी किया। लेकिन कांग्रेस ने उन्हें न तो सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में रखा और न ही राज्यसभा में नामित किया।

उन्होंने नक्सलवादियों और सरकार में समझौते की कोशिश भी की। लेकिन प्रमुख नक्सली नेता राजकुमार आजाद की पुलिस मुठभेड़ में मौत ने उन्हें नक्सलियों में अविश्वसनीय बना दिया।अण्णा आंदोलन केप्रमुख सूत्रधारों में भी वह थे।

अण्णा का पहला अनशन उनके जंतर मंतर स्थित कार्यालय से ही संचालित हुआ। लेकिन रामलीला मैदान वाले अनशन में अरविंद केजरीवाल केसाथ उनके गंभीर मतभेद हो गए और कपिल सिब्बल केसाथ उनकी कथित टेलीफोन बातचीत की वीडियो रिकार्डिंग टीवी चैनलों पर आ जाने के बाद टीम अण्णा से उन्हें बाहर कर दिया गया।
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