जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी आंदोलन पर पैनी निगाह रखने वाले मसर्रत आलम भट्ट को हुर्रियत कांफ्रेंस के चेयरमैन सैयद अली शाह गिलानी का उत्तराधिकारी मानते हैं।
मसर्रत आलम साढ़े चार साल से जम्मू-कश्मीर की बारामुला जेल में बंद था, हालांकि शनिवार को राज्य के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के आदेश के बाद उसे रिहा कर दिया गया। मसर्रत को 2010 में कश्मीर में अलगाववादी प्रदर्शन और सुरक्षा बलों पर पथराव कराने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
2010 में कश्मीर में हुए राष्ट्रविरोधी प्रदर्शनों में 120 लोगों की मौत हो गई थी। मसर्रत की रिहाई पर हंगामे के बाद केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर सरकार से जवाब मांगा था।
गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में सोमवार को बताया कि मसर्रत के खिलाफ 27 आपराधिक मुकदमे दर्ज थे, जिनमें हत्या के प्रयास, राजद्रोह और षडयंत्र जैसे मामले शामिल हैं। हालांकि उन सभी मामलों में कोर्ट ने उसे जमानत दे दी है।
गृहमंत्री ने बताया कि 2010 में कश्मीर हुए राष्ट्रविरोधी आंदोलन के बाद मसर्रत को हिरासत में ले लिया गया था। उसे पहली बार जन सुरक्षा कानून के तहत अक्टूबर, 2010 में हिरासत में लिया गया। उसके बाद से उसे उसी कानून के तहत 8 बार हिरासत में लिया जा चुका है। हालांकि जन सुरक्षा कानून के तहत किसी को अधिक से अधिक दो सालों तक हिरासत में रखा जा सकता है।
गृहमंत्री ने बताया कि जनसुरक्षा कानून के तहत किसी को छह महीने तक ही हिरासत में रखा जा सकता है, और उसे बढ़ाकर अधिक से अधिक दो वर्ष किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि उच्च न्यायालय के आदेश के मुताबिक किसी एक मामले के आरोप में दो वर्ष से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। दो वर्ष के बाद नए अरोपों के आधार पर ही हिरासत में रखा जा सकता है।
मसर्रत साढ़े चार साल से जेल में बंद था। हालांकि गृहमंत्री के बयान के बाद ये सवाल भी उठा कि क्या मसर्रत को 2012 के बाद गैरकानूनी तरीके से जेल में रखा गया था? सवाल ये भी उठा कि मसर्रत एक राजनीतिक कैदी है या आंतकी?