बेटा घर का चिराग होता है, लेकिन इसी चिराग ने आमिर शाहबान कसाब के सभी सपनों को आग लगा दी। कसाब के पिता आमिर शाहबान कसाब फरीदकोट गांव में ठेले पर समोसे बेचकर परिवार को पालते थे। कुछ दिनों तक उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि यह उनका ही बेटा है।
मगर समय के साथ-साथ उन्होंने इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार कर लिया। इसी शर्मिंदगी के बोझ तले आमिर शाहबान ने गांव छोड़ना ही बेहतर समझा। कसाब के पकड़े जाने के बाद छोटी बेटी सुरैया और बेटे मुनीर समेत पूरा परिवार लापता हो गया। वो कहां है किसी को नहीं पता। गांव में किसी को उनके बारे में कोई खबर नहीं है। या फिर शायद कोई उनके बारे में खबर लेना भी नहीं चाहता।
खिलौने की बंदूक से भी डरता था कसाब
मुंबई की सड़कों पर हैवान की तरह बेकसूरों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाने वाला अजमल कसाब बचपन में खिलौने की बंदूक से भी डरता था। सुनकर थोड़ा अटपटा लगता है। 12 साल की उम्र में उसकी आंखों के सामने कसाब के एक रिश्तेदार को गोली मार दी गई थी, जिसके बाद से वह खिलौने वाली बंदूक देखकर भी सिहर जाता था। मगर आतंकी ट्रेनिंग के बाद इसी आदमी की एके-47 राइफल के साथ तस्वीर अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का खौफनाक चेहरा बन गया।
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के दक्षिण में एक छोटा सा गांव है फरीदकोट। इस गांव में कसाब पैदा हुआ, इन्हीं गलियों में उसने चलना सीखा। लेकिन 26/11 के बाद इस गांव के लोग उसे याद रखना नहीं चाहते। फरीदकोट के लोगों में गुस्सा है, क्रोध है क्योंकि एक आदमी की गलती के चलते पूरा गांव बदनाम हो गया। फरीदकोट में कोई भी इस नाम को याद रखना नहीं चाहता। उनके लिए तो अजमल कसाब चार साल पहले ही मर गया था।
फरीदकोट भी पाकिस्तान के उन्हीं गांवों में से एक है, जो गरीबी के साथ गुमनामी के अंधेरे में खोया हुआ है। मगर 2008 में मुंबई हमले के बाद जब कसाब ने बयान दिया कि वह ओकारा जिले के इसी गांव से संबंध रखता है, तो यकायक यह छोटा सा गांव अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर उभर गया।
पत्रकारों ने भी इस गुमनाम गांव को ढूंढ निकाला। शर्मिंदगी का बोझ न सिर्फ कसाब के परिवार वालों को बल्कि गांव के एक-एक बाशिंदे को उठाना पड़ा। शायद यही कारण है कि आज उनमें बेहद गुस्सा है, झल्लाहट है। वे कसाब के बारे में किसी से कोई बात करना नहीं चाहते। वो इस नाम को हमेशा-हमेशा के लिए अपने जेहन और गांव से मिटा देना चाहते हैं।