फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आखिर इस आम चुनाव में कहां हैं किन्नर?

Sun, 04 May 2014 08:44 AM IST
विकास पांडे/बीबीसी मॉनिटरिंग
विज्ञापन
विज्ञापन
बॉबी नामक किन्नर ने कहा, "मुझे वोट देने का कोई उत्साह नहीं। चुनाव बड़े शहरों के लिए एक अच्छी सी चीज़ है। क्या कोई सोचता है कि हम गांवों में अपनी जीविका कैसे चलाएँगे ?" लेकिन वहीं मौजूद प्रियंका सोचती हैं कि किन्नरों को वोट देना चाहिए क्योंकि मुद्रास्फीति और महंगाई बढ़ने का असर उन पर भी पड़ता है।
विज्ञापन


वे कहती हैं कि वो स्कूल नहीं जा सकीं क्योंकि पुराने लोगों को लगता है कि किन्नरों का काम केवल नाचना-गाना है, पढ़ना नहीं। वे चाहती हैं कि अगली सरकार किन्नर बच्चों की पढ़ाई के लिए कोई विशेष योजना बनाए। इस मोहल्ले के लोगों ने बताया कि अब तक कोई राजनेता उनसे मिलने इस इलाक़े में नहीं आया है।

बॉबी कहती हैं, "हमारी हालत देखिए। देखिए, हम किन हालात में रह रहे हैं। आप जब मंत्रियों से मिलें तो उन्हें हमारे बारे में ज़रूर बताएं।"

सामुदायिक चेतना पर असर

टीना को उम्मीद है कि इन फ़ैसलों के बाद उनके समाज को बुनियादी मानवीय सुविधाएँ मिलनी शुरू हो सकेंगी। इस पर रानी ने कहा, "यह एक अच्छी शुरुआत है क्योंकि हम पुरुष या स्त्री के रूप में नहीं पहचाने जाना चाहते। लेकिन मुझे यह भी नहीं पता कि इस बदलाव का हमारी सामुदायिक चेतना पर क्या असर पड़ेगा।"

वहीं मौजूद बबली ने कहा, "चुनाव आयोग ने हमें जो सबसे महत्वपूर्ण चीज़ दी है, वो है स्वतंत्रता।"

भारत के कई हिस्सों में किन्नरों को तरह-तरह के अपमानजनक संबोधनों से पुकारा जाता है। यह समुदाय आमतौर पर समाज की मुख्यधारा से दूर हाशिए पर जीवन जीता है।

बबली कहती हैं कि वो चुनाव में गर्व के साथ अपने नए पहचान पत्र के साथ इस बार वोट देंगी और अन्य किन्नरों से भी अनुरोध करेंगी कि वो भी ऐसा ही करें। उन्हें उम्मीद है कि अब समाज में लोग उनके प्रति नकारात्मक राय बनाना बंद करेंगे।

हाल ही में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फ़ैसले में भारत सरकार को किन्नरों को 'तीसरे लिंग' के रूप में मान्यता देने के लिए कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किन्नरों को अल्पसंख्यकों की मान्यता दी जाए।

अल्पसंख्यक का दर्जा

बॉबी कहती हैं कि उन्हें नहीं लगता कि वोट देने से उनके समुदाय को कोई फर्क पड़ेगा। कोर्ट ने कहा है कि दूसरी बुनियादी सुविधाओं से साथ ही किन्नरों को अल्पसंख्यक के रूप में रोज़गार और शिक्षा में दिया जाने वाला आरक्षण भी दिया जाए।

एक अनुमान के मुताबिक़ देश में तक़रीबन 20 लाख किन्नर हैं। इनमें से ज़्यादातर को उम्मीद है देश की अगली सरकार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का पालन करेगी।

मैंने रानी और उनकी दोस्तों को बताया कि दिल्ली और मुंबई के किन्नरों ने इन दोनों फ़ैसलों पर जश्न मनाया था।
घर में हमारे साथ बैठीं रीना कहती हैं, "बड़े शहरों में किन्नरों का जीवन तुलनात्मक रूप से आसान होता है। छोटे शहरों में हमारी समस्याएँ काफ़ी अलग हैं।"

रीना कहती हैं कि वो वोट देने के ख़िलाफ़ नहीं हैं लेकिन उन्हें किसी राजनीतिक दल में कोई भरोसा नहीं है, मुझे नहीं लगता है कि वो कभी हमारे बारे में सोचेंगे। जब मैंने रानी से पूछा कि दिल्ली और मुंबई के किन्नरों से उनकी समस्याएं किस तरह अलग हैं ?
विज्ञापन

किन्नरों के लिए विशेष नीतियां

प्रियंका सोचती हैं कि किन्नरों को वोट देना चाहिए क्योंकि महंगाई जैसे मुद्दे उन्हें भी प्रभावित करते हैं। वे कहती हैं, "गांवों और छोटे कस्बों में लोग आज भी हमें ब्याह-शादी में पैसे के लिए नाचने-गाने वाला समझते हैं। यहाँ के लोग हमें वेश्यावृत्ति करने वाला भी मानते हैं।"

रानी कहती हैं, "हम भी मनुष्य हैं, हम भी इस समाज के सदस्य हैं। हम केवल पहचान और सामान्य जीवन चाहते हैं। हमें उम्मीद है कि राजनेता हमें संभावित मतदाताओं के रूप में देखेंगे और हमारे लिए विशेष नीतियां बनाएंगे।" वे कहती हैं, "अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हमें पहचान दी है।"

एक अन्य किन्नर टीना कहती हैं उन्हें उम्मीद है कि उनके समाज को बुनियादी मानवीय सुविधाएँ मिलनी शुरू हो सकेंगी। वो कहती हैं, "हमें हमारे लोगों को दिन में श्मशान में जलाने भी नहीं दिया जाता। हमें अपने दोस्तों को अंतिम विदाई देने के लिए रात होने का इंतज़ार करना पड़ता है।"

अब मैं रानी के घर से निकलकर बगल वाली गली की तरफ़ मुड़ चुका था। इस गली में मिले कुछ किन्नरों से मैंने पूछा कि क्या वे सब इस चुनाव में वोट करेंगी।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें