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जब कलाम ने रोका था ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल

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राष्ट्रपति रहते हुए ए पी जे अब्दुल कलाम का कार्यकाल बेहद प्रेरणादायक रहा। उनके कार्यकाल के दौरान कुछ ऐसे कठिन पल भी उनके सामने आए। जिसका उन्होंने अपनी सूझ बूझ और निष्पक्ष छवि के बल पर मामले को बिना तूल दिए हल कर दिया।
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तत्कालीन यूपीए सरकार के ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल को रोकने का मसला सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा। वहीं आधी रात में बिहार में राष्ट्रपति शासन को मंजूरी देने का मामला भी चर्चा का विषय रहा।

उस समय इन मसलों को लेकर राष्ट्रपति और तत्कालीन यूपीए सरकार के बीच टकराव की स्थितियां आज भी याद की जाती हैं। कलाम के सचिव रहे नायर ने काफी बाद में खुलासा भी किया था कि वह ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल को लेकर काफी विचलित थे। कलाम ने इस मसले को अपने 2002 से लेकर 2007 तक के कार्यकाल का सबसे कठिन पल करार दिया है।
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कांग्रेस नेताओं की बढ़ गई थी धड़कनें

पूर्व फिल्म अभिनेत्री और सपा सांसद जया बच्चन की राज्यसभा सदस्यता 17 मार्च, 2006 को जाने के बाद ऑफिस ऑफ विवाद शुरू  हुआ। इसके बाद राष्ट्रपति के पास 50 से ज्यादा सांसदों के खिलाफ शिकायतों का अंबार लग गया।

एक से ज्यादा दो पदों पर रहकर सरकारी फायदा उठाने के मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, तत्कालीन लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी जैसे कई बड़े नामों की सदस्यता भी विवादों में आ गई।

विवाद से बचने के लिए सरकार ने कई पदों को इस कानून से बाहर करने के लिए बाकायदा यह बिल संसद से पास कर 25 मई, 2006 को राष्ट्रपति के पास भेज दिया।

तीस मई को राष्ट्रपति कलाम ने इसे पुनर्विचार के लिए संसद के दोनों सदनों को वापस भेज दिया। बिल वापस भेजने से कांग्रेस नेताओं की धड़कनें तेज हो गई थी।

राष्ट्रपति ने बिल लौटाते हुए संसद को इस मामले में ऐसा विस्तृत मानदंड बनाने के लिए कहा था जोकि सभी राज्यों में पारदर्शी तरीके से लागू हो।

उनके सचिव नायर के मुताबिक कलाम को इस बात का ऐतराज था कि कुछ लोगों को राहत देने के मकसद से ही यह बिल बनाया गया था, जबकि जिन पदों पर यह खास लोग बैठे थे। ऐसे ही कई पद और भी थे। जिनकों बिल में शमिल नहीं किया गया था। जिसकी वजह से कई दूसरे लोग प्रभवित हो रहे थे।
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कलाम ने आधी रात को दी थी राष्ट्रपति शासन लगाने की मंजूरी

इसके बाद एक अगस्त यूपीए सरकार ने इस बिल में बिना किसी बदलाव किए दुबारा इसे संसद से पास कराकर राष्ट्रपति के पास भेज दिया। संविधान के मुताबिक दूसरी बार भी बिल भेजने पर राष्ट्रपति को इसको मंजूरी देने के अलावा कोई चारा नहीं था।

मगर नायर कहते हैं कि वह इस बिल को लेकर विचलित थे इसलिए उन्होंने इस बिल को पास करने में 17 दिन लगाए। 17 अगस्त को लोकसभा ने इस मसले पर राष्ट्रपति की चिंताओं पर विचार करने के लिए संयुक्त संसदीय समिति का गठन कर दिया।

वहीं 18 अगस्त को कलाम ने इसे लेकर अपनी सहमति दे दी। राजनीतिक जानकार कहते हैं कि 2005 में आधी रात में बिहार में राष्ट्रपति शासन की मंजूरी देना भी कलाम के लिए मुश्किल भरा था। वह उस समय मॉस्को में थे और यूपीए सरकार राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने को आमदा थी।
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