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घर-परिवार में महिलाओं को कब मिलेगा बराबरी का हक?

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भारत के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की जिंदगी मुश्किलों से भरी होती है। घर के कामकाज से लेकर खेतों में मजदूरी तक उन्हें करनी होती है। लेकिन इन सबके बावजूद उन्हें अपने ही घर और संपत्ति का मालिक नहीं माना जाता।
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इसके बावजूद वे नए-नए मुकाम बना रही हैं। संयुक्त राष्ट्र 25 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस के तौर पर मनाता रहा है, जबकि 17 अक्टूबर को गरीबी उन्मूलन का अंतरराष्ट्रीय दिवस है।

संयुक्त राष्ट्र ने 2014 को पारिवारिक खेती (फैमिली फार्मिंग) का अंतरराष्ट्रीय साल घोषित किया है। भारत की लाखों ग्रामीण महिलाएं अपनी मेहनत मजदूरी के बूते पारिवारिक खेती को संभालती आई हैं।
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लेकिन जब मल्कियत की बात आती है, तो उन्हें परिवार का सदस्य नहीं माना जाता है। मालिकाना हक के तौर पर उनका नाम दर्ज नहीं होता। ग्रामीण महिलाओं का बड़ा तबका गुरबत में जीवन यापन करता है।

जबरन विस्थापन से महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। वर्ष 1990 के बाद से ग्रामीण भारत के लिए विस्थापन एक बड़ी समस्या के तौर पर उभरा और इसने लाखों लोगों की आजीविका को नष्ट किया है।

कड़ी मेहनत करने को मजबूर महिलाएं

सरकार निजी एवं सरकारी औद्योगिक प्रोजेक्ट और विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज़) के लिए जबरन जमीन का अधिग्रहण करती है। जब ऐसा होता है तो महिलाओं को पानी, जलावन और चारे की तलाश में कहीं ज्यादा दूरी तय करनी होती है। ऐसे में ये सब तलाश करने वे जिन इलाकों में जाती हैं, वहां के स्थानीय लोगों के विरोध का सामना भी उन्हें करना होता है।

इतना ही नहीं, विस्थापित लोगों के लिए आज तक काम का कोई बेहतर विकल्प नहीं बन सका है। भारत के पूर्वी राज्य ओडिशा के सबसे कामयाब किसानों में एक हैं गुज्जरी मोहंती, लेकिन आप उनके चेहरे पर विस्थापन का डर देख सकते हैं।

सत्तर साल से ज्यादा की उम्र है और वो पान के पत्तों की खेती करती है। लेकिन उनका गांव स्टील के बड़े प्रोजेक्टों में से एक पोस्को की योजना के तहत आ रहा था और राज्य सरकार ने गुज्जरी सहित तमाम दूसरे किसानों की जमीन इस परियोजना में देने का वादा कर दिया।

वे पूछती हैं, "वे क्या नौकरी दे पाएंगे। इन फैक्ट्रियों में मशीन के जरिए काम होता है, मज़दूरों की जरूरत नहीं होती। क्या कंप्यूटर और मोबाइल से ज्यादा लोगों को नौकरियां मिली हैं या कम हुई हैं? इन दिनों कोई डाकिया क्यों नहीं दिखाई देता? आप हमारे पान के खेतों को देखिए और ये भी देखिए कि कितने लोगों के जीवन को सहायता मिलती है।"

आत्महत्या करने को मजबूर होती हैं महिलाएं

ग्रामीण महिलाओं को दूसरे तरह के शोषण का सामना भी करना पड़ता है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 1995 से अब तक भारत में तीन लाख किसानों ने खुदकुशी की है। सरकारी आंकड़ों में खुदकुशी करने वालों में ज्यादातर पुरुष ही होते हैं।

लेकिन इससे महिलाओं पर काफी ज्यादा दबाव आ जाता है, उन्हें अपने परिवार का बोझ उठाना पड़ता है। बैंक, महाजन और सरकारी दफ्तरशाही भी उनकी मुश्किलों को कई गुना बढ़ा देते हैं।

एक वास्तविकता ये भी है कि आत्महत्या करने वाली महिला किसानों के मामले दर्ज नहीं होते, क्योंकि महिलाओं को किसान नहीं माना जाता, उन्हें केवल किसान की पत्नी माना जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उनके पास संपत्ति का अधिकार नहीं होता। संपत्ति पर मालिकान हक में महिलाओं का नाम अमूमन नहीं होता है। (आत्महत्या ग्रामीण भारत में गैर किसानी पृष्ठभूमि वाली महिलाओं की मौत की सबसे बड़ी वजह है।)

दुर्भाग्य ये है कि दुनिया भर में लाखों महिलाओं को साल दर साल इन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। यह तब है जब उन्हें मौजूदा समय की आधी से ज्यादा समस्याओं का हल करने का नज़रिया और क्षमता दोनों मौजूद हैं। इन समस्याओं में शामिल हैं: खाद्य सुरक्षा, पर्यावरणीय न्याय, सामाजिक और एकजुटता वाली अर्थव्यवस्था का विकास।

गंभीर बदलाव की जरूरत

इनमें से कुछ भी होने के लिए, हमें गंभीर बदलाव की जरूरत है न कि केवल मामूली कार्यक्रमों की। हमें कई महिलाओं ने बताया कि वे खेतिहर मजदूरी की जगह मालिक-उत्पादक की हैसियत में पहुंच गई हैं। इसमें वे समय और अपनी मेहनत का बेहतर नियंत्रण कर पाती हैं।

वे ये तय कर रहीं है कि क्या और कैसे उत्पादन करना है। ऐसे में इन ग्रामीण महिलाओं की आकांक्षाओं को समझने के लिए दो चीजों की दरकार है।

पहली चीज ये है कि उन्हें संसाधन पर अधिकार दिया जाए- खासकर जमीन के स्वामित्व पर। संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संस्थान (एफएओ) के आकलन के मुताबिक, विकासशील देशों में महिलाओं के पास जमीन का मालिकाना हक कम ही होता है।

अगर उनके पास जमीन का मालिकाना हक होता भी है तो वे बंजर होता है या फिर छोटा टुकड़ा भर होता है। यह दुनिया भर का चलन है। महिलाओं का मवेशियों और दूसरे संसाधनों का भी स्वामित्व नहीं होता।

दूसरी बात ये है कि महिलाओं के लिए संस्थागत ढांचा खड़ा करने की जरूरत है ताकि वे एकजुट और सामूहिकता के साथ चुनौतियों से निपट पाएं।
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महिलाओं को बराबरी का हक मिले?

इसके लिए नए सिरे से सोचने की जरूरत है। व्यक्ति विशेष आधारित माइक्रो क्रेडिट का मॉडल तो दुनिया भर में लंबे समय से चल रहा है। दुनिया भर के कई हिस्सों से इस बात के काफी सबूत मिल चुके हैं कि इसने महिलाओं के जीवन को तबाह किया है।

भारत में सबसे सनसनीखेज उदाहरण आंध्र प्रदेश से मिलता है, जहां माइक्रो क्रेडिट के चलते कई आत्महत्या के मामले सामने आए हैं और कई माइक्रो लेंडिंग योजनाओं को बंद करने का अध्यादेश जारी करना पड़ा। (इस मसले पर अफ्रीका, लैटिन अमरीका में कई उदाहरण मौजूद हैं।)

स्वंय सेवी सहायता समूह के रूप में माइक्रो क्रेडिट का लोकप्रिय विकल्प उभरा है, लेकिन ये समूह में भी कई बार व्यक्तिगत तौर पर चलाए जाते हैं।

वैसे कोई भी संस्था तब तक कारगर नहीं हो सकती, जब तक महिलाओं को कमतर आंका जाएगा। उदाहरण के लिए, घर, समुदाय, कार्यक्षेत्र और राजनीतिक क्षेत्र में उन्हें बराबरी का हक मिले। ऐसा होगा, तभी जाकर अहम बदलाव नजर आएगा।
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