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महाराष्ट्र की राजनीति में आया नया मोड़

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महाराष्ट्र के दोनों प्रमुख सियासी गठबंधनों की टूट के बाद राज्य विधानसभा चुनावों में शिवसेना महाराष्ट्र अस्मिता और मराठा स्वाभिमान का आक्रामक कार्ड चलेगी तो भाजपा को मोदी लहर का भरोसा होगा।
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वहीं कांग्रेस सत्ता विरोधी रुझान का ठीकरा एनसीपी के सिर फोड़ेगी जबकि एनसीपी क्षेत्रीय समीकरणों के जरिए अपनी सीटें बचाने की जंग लड़ेगी, ताकि चुनाव के बाद त्रिशंकु विधानसभा होने पर वह अपने सारे विकल्प खुले रख सके।

दोनों गठबंधनों में टूट की पटकथा लोकसभा चुनावों से पहले ही लिखी जा चुकी थी। जब भाजपा नेता नितिन गडकरी और नरेंद्र मोदी मनसे प्रमुख राज ठाकरे केसाथ दोस्ती की पींगे बढ़ा रहे थे और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे इसे लेकर बेहद असहज थे।
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वहीं एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार भी लोकसभा चुनावों के बाद किसी नए समीकरण में खुद को फिट करने के लिए परदे के पीछे नितिन गडकरी और उद्धव ठाकरे दोनों के साथ संपर्क में थे।

बीजेपी और एनसीपी का बड़ा ऐलान

नितिन गडकरी और शरद पवार की मुलाकात की खबर मीडिया में आने पर पवार को रक्षात्मक भी होना पड़ा था। भाजपा में मोदी शाह और गडकरी का नया नेतृत्व शुरु से ही उद्धव ठाकरे की अगुआई वाले शिवसेना नेतृत्व से असहज था।

लोकसभा चुनाव से पहले मोदी और गडकरी की राज ठाकरे से गुपचुप पकने वाली सियासी खिचड़ी पर उद्धव ने कई बार कड़ा एतराज जताया था।

तब मुंबई यात्रा के दौरान मोदी को मातोश्री जाकर उद्धव को यह भरोसा देना पड़ा था कि भाजपा शिवसेना का गठबंधन अटूट रहेगा। इसके बावजूद चुनावों के दौरान भी गडकरी राज ठाकरे से मिलते रहे।

लोकसभा चुनावों के नतीजों से महाराष्ट्र में भाजपा को अपने विस्तार की संभावनाएं दिखीं और नेतृत्व में गठबंधन का बोझ उतारने का मन बन गया। सीटों को लेकर चली लंबी रस्साकसी तो टूट की कगार तक पहुंचने की कवायद भर थी।

यही स्थिति कांग्रेस एनसीपी गठबंधन में रही। कांग्रेस नेताओं का एक बड़ा वर्ग जिनमें मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण भी शामिल हैं एनसीपी से गठबंधन को लेकर कभी सहज नहीं थे।
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चुनाव से पहले बदली रणनीति

लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद शरद पवार और दूसरे एनसीपी नेता भी नए विकल्प के लिए छटपटा रहे थे। भाजपा शिवसेना गठबंधन के मैदान में उतरने पर नतीजे एकतरफा हो सकते थे,इसलिए एनसीपी के लिए यह स्थिति मुफीद है कि चारो दल अलग अलग चुनाव लड़े।

ऐसे में विधानसभा त्रिशंकु होने और एनसीपी के इतनी सीटें जीतने की संभावना है कि अगले सत्ता समीकरण में वह खुद को फिट कर सके।

अब भाजपा अपने छोटे सहयोगी दलों के साथ मनसे को भी एनडीए में शामिल करना चाहेगी, वहीं कांग्रेस समाजवादी पार्टी और प्रकाश अंबेडकर के नेतृत्व वाली आरपीआई को जोड़कर कुछ भरपाई कर सकती।
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