न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को लेकर पिछले कुछ दिनों से आवाज़ें उठती रही हैं। विधेयक में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए छह सदस्यीय आयोग के गठन का प्रावधान है जिसके सदस्यों में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, दो अन्य वरिष्ठ जज, दो जानी मानी हस्तियां और केंद्रीय क़ानून मंत्री शामिल होंगे। आयोग की संरचना को संवैधानिक दर्जा हासिल होगा।
आयोग का नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश करेंगे। जबकि जानी मानी हस्तियों का चयन न्यायपालिका, प्रधानमंत्री और लोकसभा में सबसे बड़े राजनीतिक दल के नेता की सलाह से होगा।
जजों का कॉलेजियम क्या है?
हाल ही में जस्टिस काटजू(रिटायर्ड) ने भी भ्रष्टाचार की बात कही थी। सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम में मुख्य न्यायाधीश समेत सुप्रीम कोर्ट के पांच जज होते हैं। वहीं उच्च न्यायालय का कॉलेजियम तीन मेम्बरों पर आधारित होता है। कालेजियम को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों की नियुक्तियां और तबादलों का अधिकार होता है।
कॉलेजियम कब अस्तित्व में आया?
मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा के नेतृत्व वाली सुप्रीम कोर्ट की 9-सदस्य संवैधानिक खंडपीठ ने 6 अक्तूबर 1993 को तय किया कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश का रूतबा कार्यपालिका से ऊपर है इसलिए जजों के स्थानांतरण और नियुक्तियां कॉलेजियम द्वारा की जाएंगी।
आलोचना क्यों?
इस पूरी प्रक्रिया को पर्याप्त पारदर्शिता नहीं माना गया। कुछ आलोचकों का ये भी कहना है न्यायपालिका ने विधायिका और कार्यपालिका के अधिकारों में हस्तक्षेप किया है।
मुख्य न्यायाधीश की भूमिका
मुख्य न्यायाधीश की भूमिका को लेकर पांच सालों तक असमंजस रही। पांच जजों की समिति में मुख्य न्यायाधीश को अन्य चार जजों की राय लेनी ज़रूरी थी। मगर बाद में सुप्रीम कोर्ट की एक दूसरी खंडपीठ ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश के लिए सिर्फ दो जजों की राय लेनी ज़रूरी है। लेकिन फिर भी आरोप लगे कि मुख्य न्यायाधीश एकतरफ़ा फ़ैसले लेते रहे हैं। जबकि राष्ट्रपति की भूमिका उन फैसलों पर सहमति देने तक सीमित होकर रह गई।
नियमावली
लेकिन जस्टिस लोधा ने कहा है कि न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम के संचालन के लिए एक 9-सूत्री नियमावली भी बनाई जिसमें कॉलेजियम की सर्वोचता बरक़रार रखी गई। 1998 में मुख्य न्यायायधीश बरूचा के नेतृत्व वाली संविधानपीठ ने एक अन्य फैसले में विधायिका और कार्यपालिका पर न्यायपालिका की श्रेष्ठता को बरक़रार रखा।